भरोसा
भरोसा
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कैसे भुला दें वो पल, जब सभी पर भरोसा किया करते थे
अपने हो या पराये, समझाने से समझ जाया करते थे।
हर कोई व्यस्त घड़ियों में से कुछ पल चुराया करता था
सपरिवार सुख दुःख बांट कर सीने से लगाया करता था।
बच्चों के कारनामे, बड़ों के अनुभव हर गली बयान होते थे
अभिभावकों संग पंचायत के हुक्म सर आंखों पर होते थे।
अंजाम से बेखबर अपना जीवन न्यौछावर कर देते थे
होनी अनहोनी से दूर अपनी इच्छाओं को पूरा कर लेते थे।
आज ये सब किस्से कहानियों में कैद होकर रह गये हैं
अपने खुदगर्ज स्वभाव की प्रकृति में ही उलझ गये हैं।
