बहार आते चमन हँसेगा
बहार आते चमन हँसेगा
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बहार आते चमन हँसेगा
कली कली से सुमन खिलेगा
चढ़ा क्षितिज पर लिए चमक जो
भरी दुपहरी भुवन दहेगा
जला दिया जो जनकदुलारी
उसे पिता कब सहन करेगा
करे पढ़ाई लगन लगाकर
उसे समझ लो गगन चढ़ेगा
अगर ये जिह्वा रहे न वश में
यही समझ लो मदन छलेगा
अलग रखो तुम सदा फ़िकर को
वरन तुम्हारा बदन गलेगा
जहाँ रहेगा विपिन शजर का
वहाँ सदा घन सघन मिलेगा
पिया मिलन की लगन लगी हो
