बेपरवाह बचपन
बेपरवाह बचपन
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प्रकृति के विह्नगम दृश्यों में शुमार,
वन के बीच बहती नदी की
शोभा अपार।
इधर चट्टान उधर वृक्ष भी हरा
मित्र देखो मित्र पर
लहरें लहरा रहा,
बड़े दिनों की योजना
फलीभूत हुई, आज ज्यों
किस्मत खुल गयी
बेपरवाह बचपन
इठलाती लहरें, काश ये दिन
फिर वापस ठहरें
जितना सुख जितना सुकून
इस नदी के स्नान हुए हैं,
उससे बड़ी खुशी दूसरी न
इस जहां में है और
कल-कल जल का स्वर
देता ज्यों संदेश
यही मेरी धरती
यही मेरा देश।
जहाँ नदियाँ भी माँ
पर्वत भी पिता
ऐसी अपनी भक्ति,
ऐसी अपनी श्रद्धा।
