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jignesh 💫 💫

Others Children

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बाल श्रम

बाल श्रम

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मजबूर हुआ है, 

बालक... 

बचपन में ही ढोने लगा जीवन का भार, 

पढ़ने कि उम्र मे हाथों में आ गई ईंटें। 

दुखता कंधा तो भी वह जीवन का भार उठाता है। 

उस बालक का जीवन कहीं खो गया है। 

नन्ही जान ने सुख देखा ही नहीं,

बचपन गुज़रा उसका छोटू यह दे वह दे सुनते - सुनते। 

कौन-सा हे... 

वह ईश्वर जो नन्ही खुशियों को जला दे। 

रोते बिलखते देखे आँखें उसकी मासूम सपने। 

बचपन उसका कहीं फूल, 

तो कहीं फल बेच रहा है। 

भूखा प्यासा घूमता बचपन उसका सड़कों पे। 

जिस वक़्त को खुशियों के दामन से भरना था, 

उसे गमों से भरा गया है। 

वह मासूम आँखें सिसकियाँ लेती, 

पर रो नहीं पाती। 

जिन हाथों को पकड़ने थे। 

खिलौने... 

उन हाथों ने पकड़ लिया है, 

ईंटों का बोझ। 

किस वक़्त लिखा था। 

भगवान... 

तूने इन मासूमों का किस्मत। 

मासूम हृदय पर लहराए मजबूर मजदूरी। 

किलकारियों से भरी भूख ने, 

 नहीं देखी धूप, 

और... 

छाव बस काम करते ही रहे। 

जिन हाथों में होनी चाहिए थी, 

किताबें... 

अब वह हाथ मजदूरी की बेड़ियों, 

से बन्ध चुके हैं। 

सो गया वो आंसू पीकर , 

जब उसे हंसना था। 

कोई पूछे यादें उसकी, 

क्या बताए वो? 

जिसका बचपन सड़कों पे गुज़रा हो। 

यही हे आज का भारत। 

यही है बाल श्रम भारत।। 



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