औरत
औरत
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हर औरत में खुदा ने
भर दिया ममता की झोली
क्या कहे औरत को
खेले वो प्यार भरी होली
रिश्ता छोटा हो या बड़ा
समझौता उसने सिखा है
हर एक कड़ी को संवारना
औरत ने ही तो सिखा है
अपना हो या हो पराया
सबको अपना बनाती है
घड़ी फैसले की आए गर
औरत ही सबको मनाती है
ढल जाती है हर साँचे में
ऐसी मुलायम मिट्टी है
ना समझ पाए बात उसकी
औरत वो ऊंची चोटी है।
