अटल विश्वास की खूँटी
अटल विश्वास की खूँटी
1 min
374
दहकती है, अगन- ज्वाला।
चुभे अंतस, निठुर-भाला।
चटख कर है, कहीं टूटी।
अटल विश्वास की खूँटी।।
जली तिल-तिल, सदा, खुश हो।
सपन कल के, सजाती वो।
सजाती है, चिता उनकी।
इकट्ठे जो सपन, सबकी।
रहित है हर, मनोरथ से।
चुभे कंटक, अगम-पथ के।
न हँसती है, न रोती है।
जली उम्मीद, धोती है।।
भुलाए ग़म, जिसे पाकर।
वही दुख दे, गया आकर।
दुआएँ रो, रहीं हैं यों?
स्वयं को कोसती हों ज्यों।।
सहारे ने, जड़ी लाठी।
बुढ़ापे में, छिली काठी।
तड़पती इस, कदर ममता,
नहीं उपमान की समता।।
