अस्थिरता
अस्थिरता
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सामाजिक उथल पुथल का दौर है।
हर तरफ दिखावे और झूठी हमदर्दी का शोर है।
अमानवीयता को देखकर बहुत कुछ करना चाहता है।
लेकिन मूक दर्शक बना रह जाता है इंसान।
असंख्य प्रयासों को असफल होता देखकर
हताश हो जाता है इंसान।
मन के अंतर्द्वंद्व से जूझता रहता है।
पुरुषार्थ करने से घबराता है इंसान।
