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Madhurendra Mishra

Others

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Madhurendra Mishra

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असलियत-ए-ज़िन्दगी

असलियत-ए-ज़िन्दगी

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अकेलेपन के दौर में,

ज़िन्दगी की होड़ में,

हम वक़्त को कोसते हैं,

दूसरों की थाली में ज़हर परोसते हैं।

लगता है गलत जमाना है,

जीने के लिए कुछ न कुछ तो कमाना है।

क्या इश्क़ की औकात है,

बस यही तो मुदद-ए-बात है।

अपनों से दूर चले गए,

न जाने कितने आँसू मले गए।

न पूछ हरकतें महफ़िल की,

न पूछ नजाकतें दिल की।

प्यार के अनेकों बहाने हैं

दिमाग के अनोखें तराने हैं।

तब भी दर्द-ए-ज़िन्दगी में जीते हैं,

न जाने कितने गम के प्याले पीते हैं।


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