अमृत
अमृत
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नारी अमृत की वो बूँद है,
जो कभी सूखती नहीं।
समय के बादलों को चीरती ,
जिंदगी के गरम तवे पर,
ढुलकती हुई ताउम्र,
उफ तक नहीं करती।
सर्वस्व समर्पण करती।
घर परिवार की खुशियों में,
अपनी खुशी ढूँढती,
गुजार देती है जीवन तमाम ।
सिर्फ पाने के लिए,
अपनों का निस्वार्थ अनुराग।
पर कभी पा सकी है नारी,
क्या सच्चा प्रेम?
