Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
बीज
बीज
★★★★★

© Ashish Kumar Trivedi

Others

1 Minutes   7.7K    27


Content Ranking

शालिनी इंटरव्यू के लिए अपनी बारी की प्रतिक्षा कर रही थी। अचानक उसे लगने लगा कि सामने बैठी लड़की उसे अजीब नज़रों से देख रही है। दबी हुई हंसी से उसकी किसी कमी का मजाक उड़ा रही है। उसे याद आया कि बस स्टॉप पर खड़ा लड़का भी उसे ऐसे ही देख रहा था।

'कहीं मेरे पीठ के बटन खुले तो नहीं हैं या फिर चेहरे पर कुछ लगा हो ?' इस प्रकार की आशंका उसके मन में घुमड़ने लगी। उसने वॉशरूम में जाकर चेक किया सब ठीक था।

लेकिन यह पहली बार नहीं हुआ था। अपने व्यक्तित्व के विषय में एक हीन भावना बचपन से उसके मन में थी। हर नज़र उसे अपने भीतर कमी खोजती सी लगती थी। हर मुस्कान तंज़ मालूम देती थी। अपनी दादी के शब्द उसे चुभते रहते थे "न शक्ल सूरत है न बाप के पास इतने पैसे। न जाने क्या होगा इसका?" बचपन में रोपा गया एक बीज हीनता का ऐसा वटवृक्ष बन गया था कि शैक्षणिक योग्यता का बल भी डगमगा जाता था।

लघुकथा इंटरव्यू प्रतिक्षा व्यक्तित्व शक्ल सूरत योग्यता

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..