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करीब थे
करीब थे
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© Masum Modasvi

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तुम भी करीब थे हम भी करीब थे,
फिर भी जुदा-जुदा अपने नसीब थे।

मिलते रहे हमें ये लम्हें विसाल के,
महकी हुई फ़िज़ा के के मौके अजीब थे।

चलता रहा जहां में आसां सफर हमारा,
कितने नज़र के सामने जलवे नसीब थे।

छायी रही निगाहों मे रौनक बहार की,
नज़रें लुभाने वाले मंज़र अजीब थे।

सोचो मे ढल रहा था हालात का नज़रीया,
खाके नये नसीब के लिखते अदीब थे।

सो बार नाम उनका आया जबां पे हरदम,
आलम में वो ही अपने दिल के करीब थे।

जिस दर पे जाके अपना सर ये झुका है मासूम,
उस आस्था में बसते मेरे हबीब थे।

ग़ज़ल रौनक मंज़र

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