स्वच्छंद रचना - स्वप्न झरते हैं
स्वच्छंद रचना - स्वप्न झरते हैं
पतझड़ जब निराशाओं का छा जाता है घनघोर,
मन के तरूवर पर स्याह पीत वर्ण गहरा जाता है।
पर्णहरिम जब सूखने लगता आस की शाखाओं से,
नयन-रूपी कानन से तब, अविरल स्वप्न झरते हैं।
संवारती है नारी खुद को आकांक्षाओं के श्रृंगार से,
सप्त वचनों से सुसज्जित लोहित वेश को धरती है।
खंडित होते स्वप्न और वचन मृत हो जाते हैं जब,
धवल वर्ण के कण-कण से इंद्रधनुषी स्वप्न झरते हैं।
कुचली जातीं नन्ही कलियाँ, माली देख सिहरती है,
पल्लवन से पहले ही, देव-चरणों में वो बिखरती हैं।
कोमल करों में जब जिम्मेदारी के छाले दहकते हैं,
कोख में पनपी हर किलकारी के साथ स्वप्न झरते हैं।
उदराग्नि की भेंट जब चढ़ते हैं, मासूम निर्बोध सपने,
कलम को त्याग जीविकोपार्जन के शस्त्र पकड़ते हैं।
दम तोड़ देती है जब मन में, स्वच्छंद उड़ने की चाह,
उन्मुक्त गगन में उड़ते, पंछियों को देख स्वप्न झरते हैं।
साम-दाम, दंड-भेद से छलते, निश्छल मानव मन को,
प्रलोभन का सोम पान करा, निज स्वार्थ पूर्ण करते हैं।
करबद्ध जो थे कभी, काम निकलते आँख दिखाते हैं,
स्वहस्त से सींचे वृक्ष को देख रंग बदलते, स्वप्न झरते हैं।
