Nisha Singh

Others


4.3  

Nisha Singh

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ज़िंदगी

ज़िंदगी

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हॉस्पिटल का माहौल भी बहुत अजीब सा होता है। चारों तरफ लोग ही लोग, कुछ हैरान से कुछ परेशान से, कुछ इस इंतज़ार में कि कब उनका नम्बर आयेगा और कुछ इस इंतज़ार में कि कब उनको छुट्टी मिलेगी, स्मेल भी बड़ी यूनिक होती है हॉस्पिटल की। अगर किसी की आँखों पे पट्टी बांध के छोड़ दिया जाये तो वो भी पहचान लेगा कि ये हॉस्पिटल है।

आज आशीष को आने में थोड़ी देर हो गई। अपने केबिन की तरफ जा ही रहा था कि किसी ने आवाज़ दी। अब लोग चाहे 10 हों या 100 कितनी ही भीड़ क्यों ना हो पर एक आवाज़ कानों में पड़ ही जाती है। वो आवाज़ जो आपका नाम पुकार रही हो साफ़ सुनाई देती है और फिर जब आपका नाम कोई पुकारे तो चाहें ना चाहें पीछे मुड़ के देखना ही पड़ता है। उसने भी देखा किसी ने नाम जो पुकारा था।

“ डॉ. आशीष भार्गव...”

पर आवाज़ में दर्द साफ झलक रहा था।

“ जी कहिए क्या मदद कर सकता हूँ मैं आपकी ”

चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगा पर एक उम्र के बाद याद्दाश्त कम हो ही जाती है भले याद्दाश्त किसी डॉक्टर की ही क्यों ना हो। अरे भई डॉक्टर भी तो इंसान ही होते है। कइयों से मुलाकात हो जाती है पूरे दिन में सो उसने दिमाग पे ज्यादा ज़ोर डालना ठीक नहीं समझा।

“जी मेरी वाइफ़ की कंडीशन बहुत खराब है...” कहते कहते उसका गला भर आया।

उम्र करीब 40 साल लग रही थी उस शख्स की, उम्र के इस पड़ाव पर आँखों में आँसू उसकी तकलीफ़ ज़ाहिर करने के लिये काफी थे।

“आप परेशान मत होइये, मेरे साथ चलिये फिर बात करते हैं।“ कहते हुए आशीष अपने केबिन की तरफ चल पड़ा। बिना कुछ कहे वो शख्स भी किसी छोटे बच्चे की तरह उसके पीछे पीछे चल दिया।

“अब बताइए क्या मदद कर सकता हूँ मैं आपकी?”

“जी मेरी वाइफ़ का दो दिन पहले एक्सीडे‌न्ट हुआ था, और...”

‘और’ के बाद कुछ कह ही नहीं पाया वो। सिर झुका कर अपने आँसुओं को थामने की कोशिश कर रहा था। जो शायद उसके बस की बात नहीं थी।

“आप परेशान मत होइये मुझे पूरी बात बताइए।” कहते हुये आशीष ने  पानी का ग्लास उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“जी मेरा नाम विपिन सक्सेना है।”

विपिन सक्सेना...नाम सुनते ही आशीष के दिल पर एक याद ने दस्तक सी दी। पर नाम तो एक जैसे भी हो सकते हैं और इस वक़्त किसी याद में डूबने के बजाय उस शख्स को सम्भालना ज्यादा जरूरी समझा।

“मेरी वाइफ़ का दो दिन पहले एक्सीडेंट हुआ था, डॉ नीलिमा ने मुझे आपके पास भेजा है। प्लीज़ डॉक्टर मेरी वाइफ़ को बचा लीजिए... ” लड़खड़ाते हुए लफ्ज़ों में विपिन ने अपनी तकलीफ़ कह डाली।

नीलिमा और आशीष बचपन के दोस्त थे। यूं तो नीलिमा आशीष से दो साल जूनियर थी पर एक जैसी पढ़ाई और पेशे ने आज भी एक दूसरे से जोड़ के रखा था। नीलिमा का किसी केस का भेजना कोई नई बात नहीं थी जब भी उसके किसी पेशेंट को ऑपरेशन की जरूरत होती तो वो उसे आशीष के पास भेज देती थी आखिर आशीष एक जाना माना सर्जन जो था।

“देखिए विपिनजी आप घबराइये मत, सब ठीक हो जायेगा। आप रिपोर्टस मुझे दे दीजिए और अपनी वाइफ़ को यहां ले आइये। फ़िक्र बिलकुल मत कीजिए उन्हे कुछ नहीं होगा।”  

आशीष का शुक्रिया अदा कर विपिन वहां से चला गया और अब रह गये आशीष और उसकी थकान। विपिन के जाते ही आशीष ने ए.सी. का टेम्प्रेचर थोड़ा कम किया और अपनी कुर्सी पर ही सर टिका के आँखें बंद कर ली। सोच रहा था कि कुछ देर सुकून की सांस ले ले पर एक डॉक्टर के नसीब में आराम होता ही कहाँ है... बार बार विपिन का चेहरा आशीष की आँखों के सामने आ कर उसे याद दिला रहा था कि वो एक डॉक्टर है आराम कैसे कर रहा है।

“देखूँ तो आख़िर हुआ क्या है जो नीलिमा ने केस मेरे पास भेज दिया...” सोचते हुए आशीष ने एक एक कर सारी रिपोर्टस चेक कर डाली।  

थोड़ी सी कोम्प्लीकेशन ज़रूर थी पर इतनी ज्यादा भी नहीं कि नीलिमा हेंडल ना कर सके। फिर क्या वजह हो सकती थी जो नीलिमा ने केस आशीष के पास भेज दिया। बेकार की जद्दोजहद में पड़ने के बजाय आशीष ने नीलिमा को कॉल कर लेना ज्यादा बेहतर समझा।

“हेलो”

“हाय आशीष...”

“ये केस में क्या प्रोब्लम है, मेरे पास क्यों भेज दिया?”

“तो तुम्हें कोई प्रोब्लम नहीं दिखी?” नीलिमा ने हैरान हो कर पूछा।

“नहीं मैंने सारी रिपोर्टस अच्छे से चेक कीं, बस एक छोटे से ऑपरेशन की ज़रूरत है और अगर ना भी करें तो भी काम चल सकता है, सो व्हाय ऑपरेशन?”

“प्रोब्लम केस में नहीं पेशेंट में है, तुमने नाम नहीं पढ़ा?”

“नहीं, क्यों?”

“तो पढ़ो... और ये केस तुम ही हेंडल करोगे।” कह कर नीलिमा ने फ़ोन रख दिया।

मिसिज़ दीपाली सक्सेना

नाम ही काफ़ी था सब समझने के लिये कि क्यों ये केस आशीष के पास भेजा गया। यूँ तो 15 साल बीत चुके थे पर दर्द आज भी नया था। 15 साल पुराने घाव पर चोट कर दी थी इस नाम ने। फिर वही सवाल उसके कानों में गूँजने लगा था जिसने 15 साल पहले उसे तोड़ के रख दिया था। गुस्सा था या कुछ और पता नहीं पर चल रहा था आशीष को ।

क्या ज़रूरत थी नीलिमा को उसके पास ये केस भेजने की। बचपन की दोस्त है सब जानती है फिर भी... ये अच्छा नहीं किया नीलिमा ने।


“मैं अपनी लाइफ़ अच्छे से जीना चाहती हूँ आशीष, और तुम मुझे दे ही क्या सकते हो?” यही कहा था ना दीपाली ने उससे रिश्ता खत्म करते वक़्त। ऐसा दीपाली को क्या चाहिये था, डॉक्टर बनने वाला था आशीष उसे हमेशा खुश रखता फिर क्यों उसे छोड़ के चली गई वो…

तय कर चुका था आशीष कि वो ये ऑपरेशन नहीं करेगा तभी अचानक किसी ने नॉक किया।

“सर, मिस्टर विपिन सक्सेना ने अपनी वाइफ़ को एडमिट करा दिया है आपसे मिलना चाहते हैं।”

“उनसे कह दो कि मैं फ्री हो कर आता हूँ और डॉ गुप्ता को मेरे पास भेज दो।” कह कर आशीष ने अपने असिस्टेंट को टाल दिया।

वो दीपाली की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था। डॉ गुप्ता को केस समझा कर आशीष थोड़ी देर में वापस घर चला गया। लेकिन सुकून वहाँ भी नहीं था पूरी रात दीपाली का चेहरा ही उसकी आँखों के सामने घूमता रहा। जितनी बार दीपाली का चेहरा उसकी नज़रों के सामने आता दिल अजीब सी कड़वाहट से भर जाता। एक बार को तो उसे लगा कि अच्छा ही हुआ दीपाली के साथ, उसे जीने का कोई हक़ नहीं है। देर रात तक नींद नहीं आई कड़वे ख़याल दिल को सताते रहे। सुबह उठा तो 9 बज चुके थे रात मे ठीक से सो नहीं पाया था तो सर में भी थोड़ा भारीपन सा था। जाने का मन भी नहीं था और देर भी हो गई थी सो अपने असिस्टेंट को कॉल कर के कह दिया कि आज वो हॉस्पिटल नहीं आ पायेगा।

कुछ बातें होती ही ऐसी हैं कितना भी वक़्त क्यों ना बीत जाये लगती ऐसी हैं जैसे कल की ही बात हो। और जो यादें गहरे घाव दे जायें उनके दर्द का तो कहना ही क्या... ये भी एक ऐसी याद थी जो आशीष को 15 साल पहले खींच के ले गई।

कितना अच्छा चल रहा था सब कुछ पर अचानक ही आये एक तूफान ने सब कुछ खत्म कर दिया। डॉक्टर बनने वाला था आशीष,कितना प्यार करता था दीपाली से। उसके साथ ज़िंदगी बिताने के अलावा और कोई सपना देखा भी नहीं था उसने पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। छोड़ के चली गई थी दीपाली उसे, अपने सपनों के लिये या शायद पैसों के लिये। आज भी उस आखिरी मुलाकात की याद आशीष के ज़हन में पानी की तरह साफ थी।

‘क्या दे सकते हो तुम मुझे?’ जाते जाते दीपाली का किया वो आखिरी सवाल आज भी उसके दिल में वैसे ही चोट कर रहा था जैसी तब की थी।  

भूल जाओ पुरानी बातों को... जो हो गया सो हो गया आने वाले कल के बारे में सोचो... जैसी बातें सुनने में तो बहुत अच्छी लगती हैं पर असलियत से इनका कोई लेना देना नहीं होता। कहने वाला, दिल दुखाने वाला भूल सकता है पर जिसने सुना,जिसका दिल दुखा वो चाह के भी कभी भूल नहीं पाता। दिल के ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरते जितनी आसानी से लोग बातें बना देते हैं।

भूल तो नहीं सकते पुरानी बातों को पर कोशिश तो की जा सकती है। आशीष भी कोशिश कर रहा था कि बाहर निकल पाये इन अतीत के अंधेरों से। पूरा दिन बिज़ी रखा खुद को, नाश्ता बनाया, मूवी देखी, घूमने भी गया और वो सारे काम किये जो वो कई दिनों से करना चाहता था पर वक़्त की कमीं की वजह से कर नहीं पाता था।


सुकून की नींद में सोये आशीष को अचानक आये फोन कॉल ने जगा दिया। रात के 3 बज रहे थे। कॉल डॉ गुप्ता का था। इतनी रात को आया फोन कोई अच्छी ख़बर तो लाने से रहा।

“सर, मिसिज़ दीपाली सक्सेना की तबियत बहुत खराब हो रही है आप प्लीज़ जल्दी आ जाइये।”

ज़िंदगी आशीष को ऐसे दोराहे पर ले आई थी कि आगे वो बढ़ नहीं सकता था और पीछे जाना भी मुनासिब नहीं था। क्या करे? जाये या ना जाये या किसी और को भेज दे?

आख़िरकार जीत एक डॉक्टर की हुई। जिसके लिये किसी की ज़िंदगी बचाना, अपना फर्ज़ निभाना सबसे पहले था।

“ठीक है मैं आ रहा हूँ।” कह कर आशीष ने फोन रख दिया।

आधे घंटे में आशीष हॉस्पिटल पहुँच गया। दोपहर को हुए ऑपरेशन में शायद कोई कमीं रही जो दीपाली के सिर से ब्लीडिंग शुरू हो गई। आशीष अपने मास्क को ठीक करता हुआ ऑपरेशन थिएटर में दाख़िल हो चुका था।

इतने सालों बाद दीपाली को देख कर आशीष का दिल दुगनी रफ्तार से धड़कने लगा था। आज भी दीपाली उतनी ही खूबसूरत लग रही थी जितनी कि 15 साल पहले थी। वही बोलती सी बड़ी बड़ी आँखें, वही तीखी सी नाक जिस पे हमेशा गुस्सा बना रहता था। बस थोड़ी मोटी हो गई थी चेहरा थोड़ा भर गया था तो और भी खूबसूरत लग रही थी।

ऑपरेशन करीब 20 मिनट तक चला। इस दौरान आशीष ने अपने ऊपर किसी भी पुरानी याद को हावी नहीं होने दिया।

अगले 2 दिन तक आशीष नहीं आया। किसी सेमीनार में बिज़ी था। जब पहुँचा तो दीपाली जा चुकी थी। अच्छा ही हुआ जो मुलाकात नहीं हुई ख़ामख़ा दिल पर और बोझ बढ़ जाता।

दिन बीतते गये बात पुरानी होती चली गई। कहते हैं ना कि वक़्त हर ज़ख्म का मरहम होता है वक़्त के साथ दीपाली का चेहरा भी धुँधला पड़ गया था।


करीब 6 महीने बाद

काम से कुछ दिनों की फुर्सत, एक प्याली चाय और मनाली का खूबसूरत मौसम रूह को सुकून देने के लिये काफ़ी है और चाय भी किसी 5 स्टार की ना हो कर किसी टपरी वाले की हो तो फिर कहने ही क्या...

आशीष भी कुछ दिनों की छुट्टी ले कर मनाली आ गया था। मनाली की गलियों में बस यूं ही घूमना आशीष को बेहद अच्छा लगने लगा था। मनाली की हल्की सर्द हवायें जब उसके चेहरे को बिना बताये छू जाती तो आशीष ऐसे खुश हो जाता जैसे किसी छोटे बच्चे को मन चाहा खिलौना मिल गया हो। आज घूमते घूमते आशीष को थोड़ी देर हो गई थी। मौसम में हल्की सी सर्दी भी बढ़ चुकी थी।

“मेरे रूम में एक चाय भेज दीजिए।” होटल के काउंटर पर चाय का ऑर्डर लगा के आशीष तेज़ कदमों से अपने रूम की ओर चल पड़ा। दोनों हाथों को आपस मे मलता हुआ अपने कमरे की तरफ बढ़ ही रहा था कि उसने किसी को देखा। हाँ... वो दीपाली थी, पर यहाँ कैसे...और क्यों...

इससे पहले कि आशीष वहाँ से निकल पाता विपिन की नज़र उस पे पड़ गई।

“डॉ भार्गव... आप यहाँ... ”कहते हुए विपिन ने आगे बढ़कर बड़ी गर्म जोशी से हाथ मिलाया।

“उस दिन के बाद से तो आपसे मुलाकात ही नहीं हो पाई। दीपाली, इनसे मिलो यही हैं डॉ भार्गव जिन्होंने तुम्हारी जान बचाई।”

दीपाली के चेहरे की तो रंगत ही उड़ चुकी थी। फीकी सी मुस्कान के साथ हैलो के अलवा कुछ कहते ही नहीं बना उससे।

“थेंक्यू डॉक्टर…” विपिन ने आशीष का शुक्रिया अदा करते हुए कहा।

“इसमें शुक्रिया की कोई बात नहीं है विपिन जी, ये तो हमारा काम है और फिर हम किसी को दे भी क्या सकते हैं...” कहते हुए आशीष ने दीपाली की तरफ देखा।

“ज़िंदगी...”

“जी..”

“जी हाँ... ज़िंदगी दी है आपने...” विपिन ने मुस्कुराते हुए कहा।

ये जवाब विपिन ने आशीष को नहीं वक़्त ने दीपाली को दिया था। जो सवाल दीपाली ने आशीष से 15 साल पहले पूछा था उसका जवाब उसे आज मिल चुका था। क्यों, ठीक कहा ना...



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