विधार्थी जीवन
विधार्थी जीवन
विधार्थी जीवन का नाम आते ही सबसे पहले मन में एक ही प्रश्न आता है कि क्या हुआ? कैसे हुआ? ऐसे ही अनेक अनसुलझे प्रश्नों से निरंतर मन प्रभावित रहता है और उनका उत्तर पाने की तलाश एक विधार्थी को बहुत ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है। मेरा यही मानना है और सबसे निवेदन भी यही है कि विधार्थियों की मानसिकता को समझें और उनके मन की शंका का निवारण करें। ऐसी ही एक घटना कहानी के माध्यम से आपके सामने लाने की कोशिश कर रही हूँ। तो सुनिये…..
रमेश और नरेश कक्षा दस के विधार्थी जैसे ही मास्टर जी कक्षा में प्रवेश करते दोनों झगड़ने लगते।मास्टर जी उनके इस व्यवहार से बड़ा परेशान! क्या करें? वे रोज़ दोनों को कक्षा से बाहर निकाल देते। कई दिनों तक यह क्रम लगातार चलता रहा। एक दिन तो हद्द ही हो गई! जैसे ही वे कमरे में प्रवेश करते हैं तो क्या देखते हैं? कि वे दोनों बहुत ज़ोर-जोर से लड़ रहे हैं और पूरी कक्षा दो हिस्सों में बँटी हुई है। आधे एक तरफ़ और आधे एक तरफ़। उनकी लड़ाई पूरी कक्षा को प्रभावित कर रही थी और बात सिर के ऊपर से पार होती देख उन्होने दोनों के हाथ में एक-एक पत्र पकड़ाते हुए कहा कि “अब तुम दोनों अपने अभिभावकों के साथ ही विधालय में आयेंगें और सीधे प्रधानाचार्य जी के कमरे में ही मिलेंगें।” कहकर कमरे के बाहर निकल जाते हैं।
अगले दिन सुबह-सुबह दोनों अपने अभिभावकों के साथ प्रधानाचार्य जी के कमरे में तैनात मिलते हैं और दोनों के चेहरे पर ज़रा सी भी शिकन नहीं थी कि उन्होंने कोई ग़लत काम किया है। मास्टर जी को बड़ा ताज्जुब होता है उनका यह व्यवहार देखकर! अब तो उनके आश्चर्य की सीमा ही समाप्त हो रही थी जब अभिभावक यह कह रहे थे कि “ये तो बहुत पक्के दोस्त हैं और एक दूसरे के बग़ैर एक दिन भी नहीं रह सकते।”
उस समय मास्टर जी के मन पर करोड़ों सवाल एकसाथ दस्तख दे रहे थे! उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर अभिभावक ऐसा क्यों कह रहे हैं? बच्चे तो बच्चे बाप रे बाप ये कैसा ज़माना आ गया है? अब उनके सब्र का बाँध टूटना शुरू हो गया था। आख़िर उन्होंने झट से अभिभावकों से प्रश्न किया? अगर ये दोनों पक्के दोस्त हैं तो फिर “वह रोज़ का झगड़ा क्या है?”
दोनों विधार्थी एकसाथ बोलने लगे क्योंकि आज़ उन्हें बोलने का मौक़ा जो मिला था “मास्टर जी आप सिर्फ़ पढ़ाते ही रहते हैं कुछ समझाते ही नहीं हैं और हमारे प्रश्नों के उत्तर भी नहीं देते। हमसे कहते हैं कि ख़ुद ही पता कर लो फिर कक्षा में बैठकर समय बर्बाद करने से अच्छा हमने सोचा कि क्यों ना झूठे झगड़े करके वहाँ से खिसका जाये और पुस्तकालय में जाकर अपने प्रश्नों का उत्तर ढूँढ लिया जाये।”
“अब आप सब बताइये क्या हमने कुछ ग़लत किया है? हमने तो अपना अमूल्य समय ही बचाया है।” दोनों सबके सामने अपना सवाल रखते हैं?
दोनों की बात सुनने के बाद प्रश्नचिह्न की भाँति सब अध्यापक गण एक-दूसरे का मुँह देखने लगते हैं? क्योंकि इसका ज़वाब किसी के पास नहीं था?
