वैदेही
वैदेही
वैदेही बड़े घर से थी ...।। यह सोच कर वैदेही की सासू माँ( शशि ) का दिल बैठा जा रहा था कि वह इस मध्यम वर्गीय परिवार में कैसे समायोजन करेगी ..बहुत साधारण सा खानपान रहन सहन और .. साधारण लोगों के साथ उठना बैठना.....
लेकिन कहते हैं ना....
विवाह संयोग से ही होते हैं.....
लेकिन यह क्या.. आँख खुलते ही सामने हाथ में चाय की ट्रे लिए वैदेही खड़ी थी....
मम्मी यह आपकी चाय ...मैंने नाश्ता तैयार कर दिया है ..।
आप अपने समय से दवा खाकर नाश्ता कर लीजिएगा और खाना भी बना कर रख दिया है। आप अपने समय से खा लीजिएगा..। मुझे ऑफिस को देर हो रही है... और हाँ सोनी आएगी ..तो घर की सफाई करवा लीजिएगा ..।
यह कहकर वैदेही ऑफिस को निकल पड़ती है....।
यह सब देख कर शशि आश्चर्य में पड़ जाती है कि उसकी बहू वैदेही उसकी सोच के विपरीत दिख रही है..। सारा काम समय से करके और मेरा नाश्ता और खाना सब तैयार करके ऑफिस भी करने चली गई....।
बहुत अच्छे संस्कार हैं इसमें.. यह सोचकर शशि भाव विभोर होती जा रही थी...। अब उसे लग रहा था उसका घर सुख चैन पूर्वक चल जाएगा..।
शाम होते ही शशि की कुछ सहेलियाँ घर पर आ जाती हैं नई बहू के रंग ढंग देखने के लिए...
और शशि कैसी है तेरी बहू.. सुना है बहुत बड़े घर से है ..तेरे घर में कैसे एडजस्ट करेगी और ऑफिस भी जाती है अपनी कमाई का घमंड तो तुझे दिखाएगी ही...।
यह सुनते ही शशि बोली.... नहीं नहीं... मेरी बहू तो लाखों में एक है... थोड़ी ही देर में वैदेही ऑफिस से घर आ जाती है और सासू माँ की इतनी सहेलियों को देखते ही सब के पैर छूती है और यह कहते हुए चली जाती है ...कि बैठिए ..अभी मैं चाय लाती हूँ.....।
यह देखते ही शशि की सारी सहेलियों का मुंह बंद हो जाता है... थोड़ी ही देर में .. चाय नाश्ते से भरी ट्रे सबके सामने आ गई..... और सभी ने शशि की नई बहू के हाथ चाय पी..।
इसके बाद थोड़ी ही देर में सब जाने को तैयार होती हैं और शशि उनको नीचे दरवाजे तक छोड़ कर आती है...। जाते जाते सभी सहेलियों के मुंह से निकल जाता है...।
शशि तू बहुत भाग्यशाली है....तुझे बहुत अच्छी बहू मिली है ...। जरा भी बड़प्पन नहीं दिखाती ....। सारा घर का काम बहुत अच्छे से सँभाल लिया है ....।
इस पर शशि मुस्कुराती रह जाती है..।
वैदेही ऑफिस से आते वक्त कुछ फल ले आई थी और उन पलों को अपनी सासू मां को देते हुए कहती है .... मम्मी तुम हफ्ते में दो दिन व्रत रखती हो ...
इसलिए ये फल तुम्हारे लिए हैं.. फल खाते रहिए वरना कमजोरी आ जाएगी।
यह सुन शशि फूली नहीं समा रही थी.. कि उसका ख्याल उसकी बहू कितना रख रही है।
अचानक शशि वैदेही से पूछ बैठती है..
बेटी एक बात बता ..तेरे मायके में तो सब नौकर चाकर लगे हैं.. तूने कभी घर का कोई काम नहीं किया ।
तू यहाँ पर कैसे इस तरह से कर रही है ...मुझे तो शुरू में बहुत डर लग रहा था।
आज मैं तुझे अपने मन की बात बताती हूँ....आज जो मेरी सहेलियां आई थी।
वह यही सब देखने आई थी कि तेरे रंग ढंग चाल कैसे हैं...!! क्या तू इस मेरे मध्यम वर्गीय परिवार में रह पाएगी ठीक से या नहीं... मेरा बेटा भी कोई खास नौकरी नहीं करता और तू सरकारी नौकरी भी कर रही है...।
इस पर वैदेही तुरंत कहती है...।
मम्मी तुम चिंता मत करो... मायके में मेरी मम्मी ने मुझे बहुत अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए हैं...मैं कभी ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगी जिससे आपको कोई दुख हो..और मुझे आपके बेटे से भी कोई शिकायत नहीं है।
मुझे बहुत अच्छे पति मिले हैं... मैं बहुत खुश हूँ यहाँ।
अचानक एक दिन शशि की तबीयत बहुत खराब हो जाती है... अब वैदेही ऑफिस से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर घर पर ही है और बराबर अपनी सासू माँ की देखरेख में सेवा में कोई कमी नहीं रहने देना चाहती और यह सब ऑफिस जाने में संभव नहीं हो सकता था।
शशि कहती भी थी ..वैदेही तू ऑफिस जा...मैं ठीक हूँ....मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ...।
लेकिन वैदेही तैयार ना हुई... कहने लगी मम्मी अगर मैं ऑफिस जाऊँगी तो आपका ख्याल कौन रखेगा...आपको समय से दवाइयाँ कौन देगा ...अभी कमजोरी बहुत है ..जब आप ठीक हो जाएंगी... तब मैं ऑफिस जाने लगूँगी।
आज शशि अपने आप को सच में भाग्यशाली समझ रही थी और ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद कर रही थी।
उसके मन में बहू को लेकर जितने नकारात्मक विचार थे... आज सब खत्म हो रहे थे.....।
वैदेही भी अपने आप में बहुत ही अच्छी बहू थी.. आज उसने अपने व्यवहार से पूरे घर को बाँध रखा था ...।
जिस सासू माँ के मन में उसके लिए अच्छे विचार नहीं थे..। उसने अपने व्यवहार से अपनी सासू माँ के दिल में धाक जमा ली थी। और अपनी सासू माँ के नकारात्मक दृष्टिकोण को हमेशा के लिए बदल दिया था।
क्रमश: भाग 1
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को यह कहानी समर्पित
