Dr Jogender Singh(jogi)

Children Stories


4.3  

Dr Jogender Singh(jogi)

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टेनिस बॉल

टेनिस बॉल

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डॉक्टर साहब ! “ आइये खेला जाये ”प्रवीण जोश से बोला ।

“नहीं बेटा , मेरा मन नहीं है आज ।” मैंने नाटक किया ।

प्रवीण को आप जानते ही होंगे ? वही , शुक्ला जी का दस साल का बच्चा । शुक्ला जी कन्नौज वाले , जिनका परफ़्यूम का काम है । ठीक समझे आप , इन्दिरा नगर स्टेट बैंक के एकदम सामने वाला मकान । प्रवीण अक्सर मुझे मिल जाता है पार्क में अपना बैट लिए । वो मुझे डॉक्टर साहब ही पुकारता है । शुक्ला जी और उनकी धर्मपत्नी के बार / बार समझाने के बाद भी प्रवीण ने कभी मुझे अंकल नहीं बोला । 

उसका तर्क भी उचित था । “ जब भी बीमार पड़ता हूँ डॉक्टर साहब ही मुझे ठीक करते हैं , इसलिए मेरे लिए यह अंकल नहीं डॉक्टर साहब हैं । और एक बात बताओ पापा किसी के अंकल उसको इंजेक्शन लगाते हैं कभी ? शुक्ला जी के पास प्रवीण के सवाल का कोई उत्तर नहीं था । सो मैं बन गया प्रवीण का डॉक्टर साहब ।

“आज एक नयी चीज लाया हूँ , देखेंगे आप ? उसने हाथ पीठ के पीछे सिमटे हुए थे , मानो कुछ छुपा रहा हो । 

हूँ— प्लास्टिक की भारी वाली बॉल होगी ? मैंने अंदाज़ा लगाया ।

"ग़लत !"! उसको मेरा अनुमान ग़लत होने पर मज़ा आ रहा थी ।उस से ज़्यादा अच्छा ," आप एक कोशिश और करिए ।"

"चाकलेट ? पक्का चाकलेट ही है ।" मैंने उसकी आँखों में झांका ।

"फिर ग़लत !! एक और मौक़ा , आख़िरी "! उसकी आवाज़ में शैतानी थी ।

"इमली की गोलियों का छोटा पैकेट ! यही है , चलो दिखाओ" , मैंने उसका हाथ सामने खींचा ।

"आप बुद्दु बन गए , यह देखिए बॉल है , टेनिस बॉल । बहुत ज़ोर से उछलती है , चलिए खेला जाये ।आज पहले आपकी बैटिंग , मैं बॉलिंग करूँगा ।" 

"रोज़ तुम्हारी बैटिंग पहले होती है , आज मेरी क्यों ? वैसे यह बॉल लाया कौन ?"

"कल मैं गया था गुमटी , वहाँ है ना , अमन स्पोर्ट्स की दुकान । आपने देखी है ? "

“ नहीं मैं नहीं जानता ।" मैं वाक़ई नहीं जानता । 

"देख लीजिएगा कभी , बहुत बड़ी है । उसने अपने दोनो हाथ फैलाये । इतना सारा सामान रखा था , बेडमिंटन के रैकट , चिड़िया , बैट , विकेट , नेट और बॉल । पापा ने मुझे बॉल दिलाई । पर गुम नहीं होनी चाहिये , पूरे तीस रुपये की है ।" 

"अच्छा !! इतनी महँगी ? प्लास्टिक की ही ले लेते , सस्ती पड़ती । " मैंने गम्भीरता से कहा ।

"महँगी से कुछ नहीं होता , अब मैं बड़ा हो गया हूँ । चलिए खेलते हैं" , उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खींचा ।

हम दोनो अपनी निश्चित जगह पर पहुँच गये , आम के पेड़ का तना हम लोगों के लिए विकेट का काम करता ।मैंने बैटिंग शुरू की , रोहन नहीं आया आज ? 

"आता ही होगा, आप बैटिंग पर ध्यान दीजिए , यह बॉल बहुत ज़ोर से उछलेगी ।" प्रवीण ने पहली बॉल पर मुझे क्लीन बोल्ड कर दिया । 

मेरी पहली दो बॉल पर प्रवीण ने आराम से शॉट मारा । तीसरी बॉल को उसने उछाल कर मार दिया । “छक्का !" प्रवीण चिल्लाया ।

"आउट !! " बिना टप्पे के पार्क के बाहर गया ।मैं चिल्लाया । 

पार्क की बाउंड्री के बाहर आ कर हम दोनों बहुत देर तक बॉल ढूँढते रहे । पर बॉल नहीं मिली तो नहीं मिली ।

"चलिए , क्या कर सकते हैं , कल से प्लास्टिक की बॉल से ही खेलेंगे ।' प्रवीण ने दुःखी मन से मानो मुझे दिलासा दिया ।

“ ठीक है” मैं धीरे से बोला ।मैं भी टेनिस की बॉल खो जाने से दुःखी हो गया ।

"कोई नहीं !!" मुस्कुराते हुए प्रवीण ने अपना छोटा सा हाथ मेरे हाथ पर रख दिया । हम दोनो एक दूसरे को देख मुस्कुरा दिये ,एक प्यारी सी , हर स्वार्थ से परे , मीठी सी मुस्कान ।।



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