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Priyanka Gupta

Others


4.5  

Priyanka Gupta

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तपस्या -7

तपस्या -7

4 mins 42 4 mins 42

निर्मला की ननद के लिए एक लड़का और देखा गया । लड़के को लड़की पसंद आ गयी और सब बातें तय हो गयी ।


शादी के 15 दिन पहले ही ननद निर्मला के ससुर जी और पति के पास पहुँच गयी और कहने लगी कि ,"मैंने आप पर कितना भरोसा किया था। मुझे लगता था कि मेरे अच्छे भविष्य के लिए आपसे अच्छा निर्णय तो कोई ले ही नहीं सकता। लेकिन आप कैसे घर में मेरी शादी कर रहे हो ?" ऐसा कहकर चचेरी ननद फफक -फफक कर रो पड़ी।


सब लोग एकदम सकते में आ गए ;शादी की सब तैयारियाँ हो गयी है और एकदम से इस लड़की को क्या हो गया।निर्मला के ससुर ने प्यार से पूछा ,"बेटा , ऐसा क्या हो गया ?लड़का तो तुमसे मिला भी था और तुम्हे पसंद भी था ;तब ही तो आगे बात बढ़ाई थी। "


"आपने मुझसे इतनी बड़ी बात कैसे छुपाई। "ननद ने रुआंसी होते हुए बोला।


"तुमसे तो कुछ भी नहीं छुपाया। जितना हमें पता था ;उतना सब तो तुम्हे बताया ही था । "सब दुखी भी थे और अचरज भी हो रहा था।


"मेरी सास, सौतेली माँ है ,सगी माँ नहीं। सास ,वह भी ऊपर से सौतेली। मेरी ज़िन्दगी तो नरक हो जायेगी। ",ननद ने कहा।


"बेटा ; तुम समधन जी से मिली तो हो। हमेशा तुमसे कितना अच्छा व्यवहार करती हैं .अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर किसी के साथ रहे बिना उनके बारे में कोई राय मत बनाओ। ",निर्मला के पति ने समझाया।


"वही तो भाईसाहब ;थोड़ी देर तो वह दिखावा भी कर सकती हैं। उनके साथ रहने पर तो मेरी ज़िन्दगी नरक ही बना देंगी। खेती करके देखने पर ही पता चलता है कि कितनी मेहनत का काम है।दूर से तो सब चंगा ही चंगा दिखता है ."ननद ने कहा।


निर्मला के ससुरजी ने कहा ,"देखो अगर ,तुम्हारा उनके साथ रहना सम्भव न हो तो तुम अपने पति के साथ अलग हो जाना । तुम्हे अगर थोड़ी सी भी परेशानी हुई तो मैं खुद दामादजी और समधीजी से बात करूँगा। "


निर्मला अपन ससुर की बातें सुनकर हैरान थी कि ,"कैसे वह अपने घर की बेटी को अलग होने की सीख दे रहे हैं । "


जैसे-तैसे ननद रानी को समझा लिया गया । वैसे भी समझने के सिवा लड़कियों के पास विकल्प ही क्या होता है ?ननद की शादी की तैयारियां जोर -शोर से होने लगी । ननद का टीका लिख गया और टीका लेकर सब भाई लोग उसके ससुराल पहुँचे ।

फल ,मिठाइयाँ ,सूखे मेवे आदि सभी बहुत ही बढ़िया क्वालिटी के खरीदे गए थे । कँवर साहब के लिए एक सूट भी बनवा दिया था । दो तोले की सोने के चैन और एक तोले की सोने की अँगूठी भी होने वाले जवाई को पहनानी थी । 

लेकिन ननद के ससुर जी ने ज़िद पकड़ ली कि ,"स्कूटर दो ;टीका तो तब ही लूँगा । "

दहेज़ प्रथा आज भी ज्यों की त्यों कायम है । पता नहीं लड़कों का स्वाभिमान कहाँ चला जाता है । अपन कलेजे का टुकड़ा तो दो ,साथ ही दान -दहेज़ भी दो ।हम भारतीय तो अपनी कमाई और बचत सिर्फ दो ही जगह खर्च करते हैं ;एक तो बड़ा सा घर बनाने में और दूसरा शादी में ।


निर्मला के पति ने टीके में फ्रीज ,मिक्सर, टी वी तो दिया ही था ;तब की तब वहाँ रहने वाली दूर की बुआ से पैसे उधार लाये और ससुर जी को दिए ;उसके बाद ननद का टीका हुआ ।


ननद की शादी अच्छे से हो गयी और वह अपने ससुराल चली गयी। ननद की सास के सरल और सेवाभावी स्वभाव के सभी कायल थे। ननद को भी जल्द ही समझ आ गया कि वह जैसा सोच रही थी ,उसकी सास ;सौतेली सास वैसी बिलकुल भी नहीं थी।ननद के ज़रा सा सिर में दर्द हो जाने पर सास उसे किसी काम के हाथ तक नहीं लगाने देती थी। उसकी पसंद की अदरक वाली चाय उसे बनाकर देती थी। सिर पर बाम मलती थी।


यदि निर्मला या उनके पति या घर का कोई भी सदस्य ननद के ससुराल जाता तो सासु माँ कहती, "बेटा तुम उनके पास बैठकर आराम से बातें करो। चाय-नाश्ता सब मैं देख लूंगी।"


निर्मला की इस ननद ने अपने पीहर का कोई भी फंक्शन कभी भी मिस नहीं किया क्यूंकि उसके पीछे से सासु माँ घर को सम्हाल लेती थी।निर्मला यही कहती थी कि ,"दीदी पिछले जन्म में जरूर आपने मोती दान किये होंगे जो ऐसी सास मिली । "

कर्म सिद्धांत हम इंसानों को दिलासा देने वाला बड़ा ही अच्छा सिद्धांत हैं । 

निर्मला भी तो यही सोचकर अपने कर्तव्यों का पालन करती रही थी कि ,"पिछले बुरे कर्मों को अब भुगत रहे हैं । अब तो अच्छे कर्म कर लें । "



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