Dr Jogender Singh(Jaggu)

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4.2  

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सूना आंगन क्यों

सूना आंगन क्यों

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बहादुर सिंह और हीरा सिंह दोनों की इलाक़े में बहुत इज्ज़त थी। क्यों न हो, नंबरदार जो थे। रजवाड़े अंग्रेजों के अधीन हो चुके थे। सेना सुरक्षा की जिम्मेदारी अंग्रेजों की थी। पर कर संग्रह राजा ही करवाते थे। नंबरदार राजा के लिए काम करते थे।

दोनो का एक संयुक्त मकान गांव की सबसे अच्छी जगह पर था। बड़ा सा आंगन, जिस में पत्थर जड़े थे। आंगन देख कर ही उनकी समृद्धि का अंदाज़ा लगा सकते थे। वैसे भी घर के अंदर आने की इजाज़त कुछ ही लोगों को थी।

प्रणाम ! जगतू ने बहादुर सिंह से कहा। बोलो क्या बात है, बहादुर सिंह ने मूछें ऐंठी। हुज़ूर कुछ गलती हो गई है, शायद ! घाटी वाला खेत मेरे नाम था। अरे लगान चुका दो फिर तुम्हारा हो जाएगा। साहब, सूखा पड़ा है, खाने के लाले है, लगान कैसे दूँ। जगतु गिड़गिड़ाया था। कोई नहीं, हमारे खेतों में काम करो, मजदूरी हम देंगे तुम्हें और गुलाबो को भी लेते आना। डबल मजदूरी मिलेगी। जी हुज़ूर जगतू मरी आवाज़ में बोला।

कितने लोगों की ज़मीन हड़पी, कितनों की बीवियों को अपने साथ सुलाया ? शायद दोनों नंबरदार भूल गए थे।

समय का पहिया घूमता रहा, देश जब आज़ाद हुआ तो दोनों अधेड़ावस्था में थे। नंबरदारी चली गई। पर हेकड़ी बराबर थी। किसी दूसरे के जानवर अगर पानी पी रहे होते, दोनों भाई अपने जानवरों को पानी पिलाने के लिए , पानी पीते जानवरों को हटा देते थे।

बहादुर सिंह का एक ही बेटा था देवेन्द्र, गोरा चिट्टा, सुशील। अपने बाप और चाचा से एकदम उलट। धूमधाम से शादी हुई उसकी। बीवी भी सुंदर और संस्कारी। दोनों की एक बेटी हुई, प्यारी सी। हीरा सिंह की एक बेटी थी कांता। सांवली थी। पर नैन नक्श सुंदर थे।

बेटी होने के एक साल बाद, अचानक देवेन्द्र की मौत हो गई। और उसके छह महीने बाद उसकी बीवी की भी मौत हो गई। ज़मीनों के बिकने का सिलसिला शुरू हो गया था।

पोती का मुंह देख कर बहादुर सिंह जी रहा था, कि एक दिन बीवी भी चली गई। हीरा सिंह की लड़की की शादी कर घर जवाई ले आए थे। रमन नाम था दामाद का, पर जब उनके दो बच्चे पैदा होकर मर गए। तो रमन, कांता को लेकर अपने गांव चला गया। सदमे से हीरा सिंह की मौत हो गई। अब बहादुर सिंह और हीरा सिंह की बीवी और एक पोती बचे थे। उस बड़े से घर का सुंदर आंगन सूना हो गया था। बहादुर सिंह को सुनाई नहीं देता और दिखाई भी बहुत कम देता था।

कर्मो का हिसाब किताब यहीं हो रहा था, जो बोया था, वही काटा जा रहा था।


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