शहर से गांव की ओर
शहर से गांव की ओर
"दादी अपने गांव के बारे में कुछ बताओ ना।" समर उछलते हुए बोला।
"गाँव के बारे में? क्यों, आज तुझे गाँव की याद कैसे आई?" समर की दादी सरस्वती जी ने कहा।
"मुझे एक प्रोजेक्ट तैयार करना है जिसमें शहर और गाँव की तुलना लिखनी है और पिक्चर लगानी हैं।" समर बोला।
"तो बेटा गांव ताज़ी हवा का झोंका है । गाँव की सुबह बहुत सुहानी होती। चिड़ियों की कूजन से सारा वातावरण संगीतमय हो जाता है। सूर्योदय भी बहुत खूबसूरत लगता है।"
"वो कैसे दादी?" समर ने पूछा।
"हमारा गाँव पहाड़ों से घिरा हुआ था। तो पहाड़ों के पीछे से जब सूर्योदय होता था तो बहुत खूबसूरत लगता था। सूरज की लालिमा धीरे- धीरे पूरे गाँव पर फ़ैल जाती थी। उस दृश्य को देखने के लिए हम सब सुबह पांच बजे ही उठ कर खेत पर भाग जाते थे।"
"और दादी गाँव कि रहन- सहन कैसा था?"
सरस्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा,"सादा जीवन, सादा खान-पान। सब कुछ ताज़ा और शुद्ध मिलता था। खेत से तोड़ कर बनाई गई सब्ज़ियों की अलग ही बात होती है। सब लोग स्वस्थ रहते हैं।"
"दादी गाँव में लोग मनोरंजन के लिए क्या करते हैं?"
"बेटा, हमारे गाँव का मेला तो बहुत ही प्रसिद्ध था। पूरे एक महीने लगता था दुर्गा पूजा और दशहरे के समय में। इसके अलावा गाँव में हर माह कोई ना कोई त्योहार मनाया ही जाता था। और सब गाँववाले उसमें भाग लेते थे। साथ ही किसी ना किसी के घर में बच्चे के पैदा होने का, शादी का, गोदभराई का कार्यक्रम होता ही रहता था। पूरा गाँव शामिल होता था।" सरस्वती पुरानी यादों में खो सी गई।
"दादी अब आप इतने सालों से शहर में हो। तो आपको यहां क्या अच्छा लगता है?" समर ने उत्साहपूर्वक पूछा।
"सच बताऊं, तो कुछ भी नहीं। यहां इतना प्रदूषण है कि मेरे तो फेफड़े ही खराब हो गये। शहर में किसी को किसी से मतलब नहीं है। कोई किसी को नहीं पहचानता। सब अपने मैं मस्त हैं। किसी को किसी की परवाह नहीं है।" सरस्वती जी ने कहा।
"पर दादी शहर विकास के मामले में बहुत आगे है। क्या कुछ नहीं है यहां।" समर बोला।
"हां बेटा, सब कुछ है पर अमन और सुकून नहीं है। भागदौड़ भरी ज़िन्दगी है। आराम की सब सुविधाएं उपलब्ध हैं पर आराम नहीं है। पैसों के पीछे भागते जा रहे हैं सब।"
"यहां हर बिमारी का इलाज सम्भव है दादी।" समर ने शहर का एक और गुण बताते हुए कहा।
"गाँव में तो बिमारी ही नहीं होती थी। जब से तेरे पापा यहां आ कर बस गए, दुनिया भर की बिमारियों ने घेर लिया मुझे। ना फल सब्जियां शुद्ध हैं और ना ही वातावरण। मुझे तो मेरा गाँव ही पसंद है। एक ही इच्छा है, मरने से पहले गाँव देख लूं एक बार फिर से।" यह कह दादी उठ कर आराम करने चल दी।
समर बहुत देर कुछ सोचता रहा फिर अपने पिता के पास गया और बोला, "पापा, क्यों ना इन छुट्टियों में दादी के गाँव होकर आएं।"
समर ने अपने पापा को सारी बात समझाई तो उन्होंने गाँव जाने का प्रबंध कर लिया।
आखिरकार सरस्वती जी अपने गांव पहुंच गयीं।
"सच में दादी आपका गाँव बहुत सुंदर है।मेरे हिसाब से गाँव और शहर का कोई मुकाबला नहीं। दोनों ही हमारे जीवन के लिए ज़रूरी है। जितना आवश्यक मिट्टी से जुड़े रहना है उतना ही आवश्यक विकास करना भी है। मेरा प्रोजेक्ट बहुत बढ़िया बनने वाला है।" समर ने उछलते हुए कहा और गाँव के बच्चों के साथ पेड़ पर आम तोड़ने भाग गया।
