शादी की सालगिरह
शादी की सालगिरह
विधूर प्रदीप प्रधान अकेले घर में बैठे अपनी जिंदगी की शाम बीता रहे थे। वंदना का साथ छूटे कई साल बीते। उसकी कमी उनको बहुत खल रही थी।उसके हाथ की बनी हर चीज पसंद थी। खासतौर पर चिकन करी। उसके जैसे चिकन करी तो बस वही बनाती थी। कई दिनों से चिकन करी खाने को उनका मन कर रहा था। अपने-आप जब बहू ने पूछा तो वो मना नहीं कर पाये।
प्रदीप प्रधान जानते थे कि आज उसके बेटे की शादी की सालगिरह है, शाम को बेटे नंदीश और बहू शैलजा का घुमने जाना पहले से तय था। उनकी किफायत से घर चलानेवाली बहू ने दोपहर में एक समय का खाना बनाकर छुट्टी कर ली क्योंकि उनके प्रोगाम में डिनर भी शामिल था। जैसे ही बेटे का फोन आया बहू सज धजकर निकली और जाते-जाते सिर्फ इतना कहा "पापाजी, मुन्ना सो रहा है ज़रा देख लेना, वो नंदीश का फोन आया, आज हमारी एनर्वसरी है न, उन्होने बुलाया है, तो मैं जा रही हूँ। आपको कुछ चाहिए हो, तो कह दीजिए हम आते समय ले आते हैं। " प्रधानजी बोले "तो ठीक है बहू, आते समय मेरे लिए चिकनकरी ले आना। " ठीक है ,पापाजी " कहकर वो बाहर निकली और रिक्शा ले कर रॉक्सी थेटर की ओर चल पड़ी जहां नंदीश 6 से 9 के शो की पिक्चर की टिकट लेकर उसका इंतजार कर रहा था ।
कुछ देर बाद मुन्ने के रोने की आवाज़ सुनाई दी। दौडे-दौडे मुन्ने के पास गए पता चला वो जग गया था। कुछ देर तक उसे बहलाया-फुसलाया पास ही दूध की बोतल रखी थी। दूध पीला कर उसे थोड़ा कंधे पे लेकर घुमाया। कुछ देर बाद वो वापस सो गया। उसे सुलाकर वो हॉल में आकर आराम से बैठ गए। कुछ देर तक टी.वी.में ख़बरे देखकर समय बीताया। उनको लग रहा था कि बेटा और बहू कुछ शॉपिंग करके, खाना खाकर लौट आयेंगे एक दो घंटे में, चार घंटे बीत गए पर ये नहीं लौटे। वो बस इंतजार ही करते रह गए कि वो अब आयेंगे। उन्हें पिक्चर जानेवाली बात बताई नहीं गई थी।
यहां ये दोनों दिन-दुनियाँ भूलाये अपनी ही मौज-मस्ती में पिक्चर देखकर बाहर आए। अब ये शॉपिंग के लिए मॉल चल पड़े। एक दूजे के लिए शादी की सालगिरह का तोहफा खरीदने। अपनी मनपसंद चीज के लिए पूरा मॉल छान मारा तब कहीं जाकर इनको एक दूजे को गिफ्ट देने के लिए कुछ पसंद आया। अब तक इनको जम के भूख लगी। दोनों फाईवस्टार होटल की तरफ बढ़े। दोनों ने मजे से खाना खाया।
घर पर प्रदीप प्रधान जी को भी बहुत भूख लगी थी। साढे ग्यारह बज रहे थे। वो दोनों अब तक नहीं आये। उनसे रहा नहीं जा रहा थ । चिकन करी भूला कर जो घर में है उसी से काम चलाकर समय निकालने की बात सोच कर वो इस आस से किचन में आये कि दोपहर का कुछ तो बचा होगा ही। पर कीचन का प्लॅटफार्म एकदम साफ था। गैस के चुल्हे पर कुछ भी नहीं था। तो फ्रीज खोल के देखा तो कुछ भी नजर नहीं आया। बहुत ढूंढने पर कुछ डबलरोटी के स्लाईस एक कवर में दिखाई दिए। अब वो सोच में पड़ गए कि अब खाये तो किसके साथ ? जाम ढूंढा तो खाली बोतल थी। उन्होने सोचा चलो कॉफी के साथ डबलरोटी खाते है। दूध के बर्तन दूध नहीं था। बेचारे प्रधानजी, भूख के मारे क्या करते ? बहू की किफायती रसोई से हैरान हो गए। अब तो वंदना की कमी और ज्यादा खलने लगी। उसके जमाने उनपर ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी। कभी-कभी मज़ाक में उसे छेड़ने के लिए कुछ मीनमेख निकालने की एक्टींग करते थे पर मन से कभी कुछ नहीं कहते। फिर उसे मना लेते थे। ढूंढते ढूंढते यही सब सोच रहे थे कि फिर मुन्ने के रोने की आवाज़ ने सब छोड़ कर उसके पास जाने पर मजबूर किया। वहां जाकर देखा तो मुन्ना बेड से उतरने की कोशिश कर रहा था। उन्होने जाकर उसे संभाला। उठाकर उसे थोड़ा पानी पिलाया। फिर कुछ देर तक घुमा कर वो भी थक गए और इजी चेयरपर बैठ गए। मुन्ने को अपने सीनेसे लगा कर सुलाने लगे और सुलाते –सुलाते खुद सो गए।
