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Mrugtrushna Tarang

Children Stories Comedy Inspirational

4  

Mrugtrushna Tarang

Children Stories Comedy Inspirational

सच्चे वॉरियर्स

सच्चे वॉरियर्स

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"मेरे सभी कर्ल्स दुख रहे हैं। आ.... आउच।" केंचुए ने अपने बदन को दाएं बाएं मरोड़ते हुए कहा।

केंचुए को कसरत करते देख हरे तिलचट्टे ने उसके शरीर पर की कर्ल्स को गिनने की कोशिश की।

"एक, दो, तीन, चार...सत्रह..उन्नीस... वैसे तुम्हारें शरीर पे इतने सारे.... कर्ल्स हैं ? अंदाजन कितने होंगें ?"

"तुम्हारी गिनती कहाँ तक पहुँची ?"

"अं.... उन्नीस.... नहीं.. नहीं... बीस तक। हाँ, बराबर, बीस तक गिनते गिनते भी थक सा गया मैं, देखो।" केंचुए के साथी दोस्त ने उलाहने भरते हुए फरमाया। और दर्द से कर्राह रहे केंचुए की ही मदद मांगनी चाही।

"बस, इतनी जल्दी हार मान ली !"

"हार, और मैं ? हो ही नहीं सकता।"

"तो फिर ये क्या था ? अँगड़ाइयाँ लेना, उलाहने भरना, और..."

"अरे, अरे ! केंचुए सा'ब ! अभी तो दर्द से कर्राह रहे थे। ये कहकर की ये दुखता है, और वो दुखता है। एक ही शब्द में नहीं कह सकते कि सारा बदन दर्द कर रहा है ! हें ?" तिलचट्टे ने खीझते हुए मुँह टेढ़ा किया।

"अपन एकीच बिरादरी के बाशिंदे हैं। और फिर भी तुम अपुन की च खिंचेला है बिडू। बस क्या बिडू ! मैंई च मिला क्या सुबे से तेरेको।"

"अरे, अरे ! केंचुए भाई, ये कौनसी भाषा बोल रहे थे आप ? कुछ समझ में नहीं आया।"

तिलचट्टे की खींचने के बाद केंचुए ने हाथ जोड़ नमन कर उसे विदा किया।

और अपने बदन दर्द की उलाहना लेते हुए फिर से रोने लगा।

केंचुए को अपने ही शरीर को मिट्टी में, कोमल फूलों की डाली से रगड़ते हुए देख रैनबॉ रंग की तितली से रहा न गया। और वो अपने कोमल पैरों से उसके बदन पर चलने लगी।

"कुछ फ़र्क पड़ा क्या केंचुए भैया ! और करूँ मैं या बस हो गया ?"

"तुम्हारे नाजुक साजुक पैर तो गुदगुदी करें जा रहे थे। इससे कहाँ मेरा दर्द ठीक होना था !

फिर भी कोशिश की इसके लिए धन्यवाद।" कहते हुए केंचुआ अँगड़ाइयाँ लेने लगा।

उसे आज समझ ही नहीं आ रहा था कि, इतने सालों से वो गिली मिट्टी कुरेदने का काम करता चला आया था। तो, आज क्या हो गया ? उसके शरीर को लचीलापन देने वाले उसके कर्ल्स आज ही उसे क्यों इतना दर्द महसूस करा रहे थे !

अपनी ही उधेड़बुन में था कि उसके बदन पर किसी भारी भरकम वजन को इधर से उधर नाचते हुए पाया।

केंचुए को अपने ही देह की सुध नहीं थी। उस पर ये तांडव नृत्य करने वाले बंदे को परखना आज तो नामुमकिन सा लगने लगा।

बड़ी मशक्कत करके केंचुए ने अपना अगला हिस्सा ऊपर उठाया। तो भौंचक्का सा रह गया। उसकी बरसाती दोस्त मेंढकी के नन्हें बच्चे टैडपोल कर्ल्स पर उछलकूद कर दर्द कम करने की कोशिशों में लगे थे।

पर केंचुए को उनकी उछलकूद असहनीय होती जा रही थी। एक तो इस साल बारिश न होने से सूखा पड़ा था।

दूजा, सूखी मिट्टी उड़ेलने के चक्कर में उसके लचीले कर्ल्स दर्द दे रहे थे।

केंचुए ने टैडपोल को भी नतमस्तक प्रणाम कर विदा किया। और ख़ुदको थोड़ा सा हिलाने की कोशिश की।

तब कहीं से उसे जोरों की गुनगुनाने की आवाज़ कानों के भीतर तक झंझोड़ने लगी।

केंचुए ने अपने कर्राह रहे अगले बदन को और ऊपर उठाते हुए जाना कि, एक भँवरा उसके बदन को कुमुदिनी का गद्दा समझते हुए टहल रहा था।

"भाई केंचुए, कुछ फ़र्क पड़ा क्या ! और तेज़ी से तो चहलकदमी नहीं करनी हैं ना !" भँवरे ने भुनभुनाते हुए पूछा।

केंचुए से अब रहा न गया। और वो बिनती के स्वर में बुदबुदाया, "भाई भंवरलाल ! थोड़ा गुनगुनाना बंद करो तो बेहतर होगा।"

भँवरा हाथ जोड़े उड़ने लगा। और जाते जाते बोला, "एक वक़्त चहलकदमी छोड़ सकता हूँ। पर गुनगुनाना नहीं छोड़ सकता भाई। चलता हूँ।"

केंचुआ अपने बदन दर्द को लेकर के और परेशान होने लगा। इतने सारे लोगों ने अपबी ओर से जीतोड़ कोशिशें की। फिर भी उसका दर्द था कि, कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

तभी, उसे ठहाके की आवाज़ सुनाई दी। केंचुए को अपने कानों पर विश्वास न हुआ। वो सोचने पर मजबूर हो गया कि, उसका ऐसा कौनसा दुश्मन पैदा हो गया था। जो उसके कर्राहने का लुत्फ़ उठाते हुए हँसे जा रहा था ! !

उसने दाएं बाएं अपने पीड़ित बदन को उलटते पलटते हुए सब जगह देख लिया। पर उसे कोई नज़र न आया।

शायद मेरे ही कान बजते होंगें। सोचकर केंचुआ उसके सारे जिगरी दोस्तों की हेल्प को सराहने लगा।

नन्हीं सी गिलहरी ने, बेढंगे से ड्रेगन फ्लाई ने, और तो और भूखरी चींटियों ने भी तो दर्द से कर्राह रहे केंचुए की हेल्प की। पर कोई फायदा नहीं हुआ।

उससे उल्टा उनके दोस्त केंचुए का बदनदर्द बढ़ता ही चला गया। और, वे सारे हेल्प न कर पाने की अपनी असमर्थता जताते हुए दुःखी मन से लौट गए थे।

और तभी एक बार और केंचुए ने रावण सा अट्टहास्य सुना। और उसका पिछला हिस्सा कट गया हो वैसा कुछ उसे महसूस हुआ। उसने इस बार ऊपर की ओर अपनी नज़र दौड़ाई।

तो उसका देह यूँही कपकपाने लगा। केंचुए ने पूरजोश में बंजर जमीन के भीतर घुसने की आखरी कोशिशें की। पर आज उसके बदन दर्द ने उसे साथ न दिया। और वो जमीन के भीतर न धँस सका।

"अरे, अरे... रे... क्या हुआ तुम्हें ? तुम कर्राह क्यों रहे थे ?"

मसखरेपन से बेहाल केंचुआ अपने दुश्मन को सामने देख बेज़ुबां सा बुत बन गया। मानों गौतम ऋषि के श्राप से सती अहिल्या देवी पत्थर में तब्दील हुई थी। 

बर्बस, वो भी वैसे ही जड़वत बन गया था। आत्माविहीन सा !

केंचुआ अपने आखरी पल में उन सभी हेल्पर्स को मन ही मन धन्यवाद कहते हुए अपनी जीवनयात्रा समाप्त होते देख बुदबुदाया -

"हे प्रभु ! जीवन में जिस किसीका मेरे रहते नुकसान हुआ हो। या, मैंने किसीका बुरा किया हो। उन सभी को मेरी ओर से सॉरी। बड़ा.... वाला सॉरी।

मुझें माफ़ कर देना प्रभु।

इस भगवा चोंचधारी चिड़ा का आहार बनने से पूर्व मेरी क्षमा याचना स्वीकार कर लो प्रभु।"

"ओ केंचुए ! क्या बड़बड़ा रहे हो ? मैंने कुछ पूछा तुमसे। क्या हुआ तुम्हें ? अँगड़ाइयाँ क्यों ले रहे थे इतनी सारी ? मैं कुछ मदद करूँ क्या ?"

केंचुए के सूखी बंजर भूमि पर रातदिन रेंगते रहने के कारण हो रहे बदन दर्द से आराम दिलवाने के लिए सभी ने अपनी ओर से बारी बारी से कोशिशें की थी।

और तो और,

उसके

आधे कटे देह को जोड़ने में असहायता महसूस कर रहें सभी यार दोस्तों ने उसके बदन दर्द का रामबाण इलाज भी खोज निकालने का जीतोड़ प्रयास किया। कोई भी कारगत साबित नहीं हुआ था।

सुबह से शाम ढलने को थी।

वो खुद भी थक चुका था। पर जीवन समाप्त करने की न उसने सोची थी और न ही उसे ऐसी निराशावादी स्थिति निर्माण हुई नजर आ रही थी।

तो,

ये दर्दनाक मौत उसके ही सामने क्यों मंडरा रही थी आज। ! ?

केंचुआ खुद से ही बड़बड़ाने लगा। लेकिन थोड़े ऊँचे स्वर में, ताकि, उसका दुश्मन उसकी फरियाद सुन लें और वहाँ से रफूचक्कर हो जाये। तुरंत।

"क्या हुआ ? कौनो हेल्प नहीं चाहिए का तुमको हमरा ?

ठीक है, हम जावत है इन्है से।

वो तो सभै से तुम्हारें दर्दनाक हादसे के बारे में सुना तो मिलने चले आये हम !

सोचा, कुछ हालचाल पूछ लें तुम्हारा, हें।

और, एक नुस्ख़ा भी जानत हैं। वो भी बताते चलें।"

केसरिया चोंचधारी दुश्मन चिड़ा के मीठे बोल सुन केंचुए को 'बड़बोले कौए और चालाक लोमड़ी' वाली कहानी याद आ गई। और उसका करुण अंत भी।

केंचुए के टूटे फूटे बदन में से सिहरन सी लहरें उमड़ पड़ी। कपकपी छिपाते हुए फिर एक बार उसने अपने पिछले हिस्से से जमीन कुरेदना आरंभ कर दिया।

पर हमेशा की तरह आज वह कामयाब न हो पाया।

तो, उसने दूर रहते रहते केसरिया चिड़ा को

पूछने की गुस्ताख़ी की -

"जी, आप कौनसे नुस्ख़े की बात कर रहे थे ?"

"पहाड़ के उस पार झील के किनारे जो नया कुंड बना था पिछले साल। उसमें घुटनेभर तो पानी जरूर बचा होगा। उसमें तुम अपने बदन को सन स्ट्रोक से जन्मी डिहाइड्रेशन की बीमारी से बचा सकते हो।"

"हम्म... काश ! ये बात पहले पता चलती, तो, भँवरे के पैरों तले स्वर्ग ढूँढ़ता वहाँ पहुँच जाता।"

"क्या सोचने लगे ? हम ले जावे के नै तोहको ?"

"आप तो हमरा शिकार ही कर लोगे। फिर काहे का हेल्प और काहे की बदन सिकाई !"

"इतना सोच सोच के अपना जिगरवा मत जलाओ बबुआ ! हम सिर्फ हेल्दी कीड़ों को ही अपने ब्रेकफास्ट में अलाउ करते हैं !"

केंचुए को थरथराता देख केसरिया चिड़ा फिर चिल्लाया -

"डिसिज़्ड कीड़े पेट दर्द करते हैं। फिर इंजेक्शन लेना पड़ता है हमकू। समझे का !"

पूरी तसल्लीबख्श होकर केंचुआ केसरिया चिड़ा के पंजों में लिपटने के लिए तैयार हुआ।

और, दूसरे ही पल बदन दर्द से कर्राहते केंचुए को छै छपाक छै करता छोड़ चिड़ा वहाँ से उड़ गया।

और, कई दिनों के सूखे को झेल रहे केंचुए को तो स्वर्गलोक का चश्मेशाही मिल गया हो, वैसा आनंदमय हो उठा वो।

ऊपर आसमान की ओर नजरभर देख केंचुए ने ईश्वर को थेँक्यू कहा। और, अपने आसपास हेल्पर्स की फौज खड़ी देख खुशी से झूमने लगा।

नन्हें मेंढ़क ने स्कूल में सिखाई गई शिक्षाप्रद बातों को जोरशोर से दोहराया -

"मुसीबत में पड़ने वाले की मदद करना हर एक जीव का परम कर्तव्य होता है।"


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