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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Others


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रूपये का सम्मान ...

रूपये का सम्मान ...

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विश्व स्तरीय समारोह में नोट ( रूपये, डॉलर, पौंड आदि) का अभिनंदन किया जा रहा था।

रुपया, कॉइन, डिमांड ड्राफ्ट, चेक एवं क्रेडिट/डेबिट कार्ड मंचासीन थे। दर्शक दीर्घा में विभिन्न किस्म की सामग्रियाँ विराजमान थी। समारोह के सीधे प्रसारण को, दुनिया की सारी भौतिक वस्तुयें देख रही थीं।

कार्यक्रम संचालन कॉइन द्वारा किया जा रहा था। माइक पर प्रथम संबोधन में वह कह रही थी-

कॉइन: हम सभी आज रूपये को, "लाइफ टाइम अवार्ड" प्रदान करने के लिए यहाँ उपस्थित हुए हैं। रूपये के सम्मान में उद्बोधन के लिए मैं, सर्वप्रथम दर्शक दीर्घा में उपस्थित, महोदय /महोदया को अवसर दूँगी कि जो इच्छुक हों, वे माइक पर आकर, अपने संक्षिप्त उद्गार दें।

इस घोषणा के उपरान्त बारी बारी से, विभिन्न वस्तुओं ने, मंच पर आकर कहना शुरू किया।

प्रिंटर : रूपये की प्रशंसा में, सिर्फ इतना कहूँगा कि इसमें इतनी योग्यता है कि इसे, प्रिंट मैं करता हूँ। फिर यह मुझे ही, क्रय विक्रय के लिए प्रयोग होने लगता है।

किताब : यूँ तो हम भी कागज़ से निर्मित होते हैं लेकिन हम, सैकड़ों पन्नों में होने के बाद भी, कुछ रूपये में खरीदी-बेची जातीं हैं।

तस्वीर : मुझे देखिये कागज़ पे अंकित, 'सुंदर हंस के जोड़ों' के कारण, मैं रूपये से बहुत अधिक, आकर्षक हूँ। लेकिन 'ऐसी कई के सेट में' होकर भी मैं, एक कागज़ के छोटे टुकड़े से बने, रूपये से ख़रीद ली जाती हूँ। 

भोजन सामग्री : मुझे खा खाकर, मनुष्य नोट (रुपया) या बिल (डॉलर पौंड आदि) बनाता है मगर अनाज, फल या वनस्पति रूपों में मुझे भी किलो/क्विंटल में, कुछ रूपये में बिक जाना होता है।

औषधि : मनुष्य कहता है, "जान है तो जहान है।" मैं, मनुष्य को प्राण लेवा रोग से बचाती हूँ फिर भी रुपयों से, खरीदी जाती हूँ। कहना अतिशयोक्ति न होगी कि "रुपया है तो जहान है"।

सब ताली बजाते हैं, रुपया इस जुमले को सुन लजाता है। फिर दर्शक दीर्घा से और भी कई वस्तुयें, रुपये की प्रशंसा में, अपने अपने अंदाज में उद्गार प्रकट करते हैं।

इनके उपरांत, मंचासीन महानुभावों के, उद्बोधन आरंभ होते हैं -

कॉइन : मैं, जिसे आप गिन्नी, कलदार, सिक्कों या पैसों के रूप में पहचानते हैं। यूँ तो, मेरा महत्व कागज के बिल (नोट) जैसा ही रहा है। मगर, रुपये/पैसे के रूप में मेरा मूल्य, कॉइन न रह जाने पर भी मेरी उससे चौथाई/आधी कीमत (धातु की मात्रा का) हो, ऐसा होने पर ही मैं निर्मित की जाती हूँ। जबकि कागज़ के, 'आप रुपये' (मंचासीन रूपये की ओर, इशारा करते हुए), लगभग मूल्य विहीन टुकड़ा हैं और मुझसे, ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

चेक डिमांड ड्राफ्ट ने भी अपनी अहमियत, रूपये से कम बताई कि उनकी अहमियत भी खातों में जमा रूपये पर ही निर्भर है।

फिर बारी आई क्रेडिट कार्ड की। जब वह संबोधन के लिए माइक पर आ रहा था तो, उसकी चाल में घमंड एवं अकड़ दिख रही थी।

माइक पर आकर उसने बोलना आरंभ किया : पूर्व वक्ताओं ने रूपये की बताई खूबियों से मैं सहमत होते हुए भी, उसकी शान में थोड़ी गुस्ताखी करूँगा कि रूपये जितनी मात्रा में कागज़ों पर छापे जाते हैं उसके लिए बहुत से वृक्ष काटे जाने के बाद, कागज़ निर्मित किया जाता है। स्पष्ट है कि पर्यावरण की कीमत पर, रूपये तैयार किया जाता है। वह शीघ्र चलन बाहर होगा।

मैं चलन में प्रमुख हो जाने वाला हूँ। मेरी विशेषता है कि मनुष्य के पर्स में ही बना रहकर, मैं रूपये वाले सारे काम कर सकता हूँ। जबकि रूपये को पर्स में रखे रहने एवं निकलने घूमने का सिलसिला रखना होता है। कहना होगा कि रूपये की अपेक्षा मैं (क्रेडिट/डेबिट कार्ड) ज्यादा एफ्फिसिएंट हूँ।

इतना कहकर, कार्ड अपनी चेयर पर वापिस बैठता है। उपस्थित सभी सोच रहे हैं कि अपने अहं में, इसने यह विवेक भी खो दिया कि अवसर विशेष पर, क्या कहना उपयुक्त होता है यह समझ नहीं पाता है। 

अंत में कॉइन, रूपये को उद्बोधन के लिए, ससम्मान माइक तक ले जाती है तब,

रुपया : मैं आभारी हूँ कि आप सब, मुझे इतनी प्रशंसनीय दृष्टि से देखते हैं। मुझे हासिल, मेरी शक्तिशाली हैसियत के सामने, मेरे अवगुण कहने का साहस नहीं करते हैं। अपवाद में एक कार्ड ने ही बस, मेरी खराबी बताई है। 

जब कोई न कह सका है तो यह अपेक्षित है कि मैं स्वयं, अपने अवगुणों पर प्रकाश डालूँ। 

मेरा प्रादुर्भाव ज्यादा पुराना नहीं, लेकिन कुछ ही दशकों में मैं, अनेक बुराई का साक्षी हुआ हूँ। मैंने अपने प्रयोग से, नारी तन का सौदा होते देखा है। नग्न-अर्धनग्न युवतियों को, मेरे जोर पर नचवाते फिर, उन पर मुझे बरसाये जाते देखा है। 

मैंने मेरे प्रयोग से, नशा एवं उसके दुष्प्रभाव में लोगों को अनैतिक आचरण करते देखा है। 

मेरे प्रयोग से मैंने, किसी की हत्या किये जाने के, करार (सुपारी) होते देखे हैं। 

मैंने, मेरे प्रयोग से, इंसान का ईमान तक, खरीदे और बिकते हुए देखा है। 

इतना ही नहीं, मेरे होने से मैंने, आडंबर की चरम सीमा देखी है। जिसकी चकाचौंध में कई (दौलत के नशे में) अत्यंत अहंकारी होते हैं, और अनेक (दौलत अभाव में) हीन भावना से ग्रसित होते हैं, ऐसा मैंने देखा है। 

यह सब देख मुझे, स्वयं के अस्तित्व से, स्वयं घृणा होती है। 

यद्यपि मुझे अर्जित करने की स्पर्धा ने, दुनिया में विकास को, आज इस शीर्ष तक पहुँचाया है किंतु यह भी उचित नहीं है कि मैं, मनुष्य से अधिक महत्वपूर्ण हो गया हूँ। 

भला, किसे पसंद होगा कि अपने बनाये जाने वाले से बढ़कर, वह स्वयं उससे बड़ा, कहलाया जाने लगे।  

इन अत्यंत कटु बातों का जिम्मेदार, मैं खुद होना अनुभव करता हूँ। 

आप सब जिस सम्मान हेतु मुझे, योग्य मानते हैं, मैं स्वयं को, उसके योग्य नहीं देखता हूँ। 

अतः आप सभी का आभार मानते हुए मैं, संपूर्ण विनम्रता से इस सम्मान को ग्रहण करना स्वीकार नहीं कर रहा हूँ। कृपया मुझे क्षमा कीजिये।

अपने उद्बोधन में, यह निष्कर्ष बताते हुए, रुपया, वापिस अपना स्थान ग्रहण करता है।

अप्रत्याशित रूप से इस दृश्य को देख, सभी उपस्थित स्तब्ध होते हैं।

तब अंतिम कुछ शब्द कॉइन यूँ कहती है - जिसके बल पर, इस जगत के कुछ मनुष्य स्वयं को भगवान मानते हैं, वह (रुपया) स्वयं, खुद के अस्तित्व को धिक्कार रहा है। 

रुपये की यह सादगी, उसे हमारे सम्मान का अधिकारी बनाती है फिर चाहे, रुपया जी, इसे ग्रहण करें अथवा न करें ... 

हॉल, तालियों से गूँजता है। दुनिया भर में समारोह का सीधा प्रसारण देख रही (रिकॉर्ड सँख्या में व्यूअर) वस्तुएँ, अभिभूत होती हैं।  



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