रत्न
रत्न
साकेत अपने दोस्तों के साथ घूमने गया था। वहाँ घूम कर भरपूर मजा कर रहा था। एक दिन वह लोग घूमते घूमते एक मंदिर पर आ पहुंचे। मंदिर बड़ा प्राचीन था। सब लोग मंदिर घूम रहे थे। तभी साकेत को एक बाबा को देखा। वह एक कोने में बैठे हुए थे। साकेत को वह भिखारी की तरह लगे तो अपने पास जो खाना था वो लेकर उस बाबा को देने पहुंचा।
"बाबा, यह लो खाना। "
" बच्चे, मुझे नहीं चाहिए। मुझे भूख नही है। "
" रख लो, अभी भूख नही है। लेकिन जब भूख लगेगी तब खा लेना। "
" ठीक है, बेटा। लेकिन तुमने तो मुझे कोई आम भिखारी समझ लिया। इसलिए तुम्हें बता रहा हूँ की मैं कोई भीखारी नही हूँ। मैं एक साधु हूँ और यहाँ बैठकर साधना कर रहा हूँ। "
साकेत बड़े उत्साह पूर्वक पूछता है," आप यह साधना से प्राप्त क्या होता है।"
"बेटा, साधना से कुछ प्राप्त नही होता। बस अंतर्मन देख पाते है। "बाबा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
" अंतर्मन में क्या दिखता है? "
" जो भी तुम्हारे अंदर है और चल रहा वहीं दिखता है। "
" तो फिर मुझे कोई साधना की जरूरत ही नही है। क्योंकि मैं जानता हूँ, मेरे अंतर्मन में क्या है। "
" तो, तुम अच्छे से जानते हो। बड़ी अच्छी बात है। "
" जब एक बार जब जान गये की अंतर्मन में क्या है तो फिर पूरा जीवन साधना करने का क्या मतलब? "
बाबा अपने पास रखे झोली में से एक रत्न जो की डायमंड जैसा दिखता था वो दिया। और कहा," अगर कभी आगे यह बात याद आये तो मिलने आ जाना। मैं तुम्हें यहीं कहीं मिलूंगा। "
साकेत भी कुछ सोचे समझे और बीना कहे रख लेता है और अपने दोस्तों के साथ घर लौट जाता है।
कुछ दिन बाद काम के लिए घर से निकलने में देर हो गई। वह सोच रहा था की कोई मदद मिल जाये। न जाने कहाँ से वो डायमंड उसके हाथ में आ गया। और उसने देखा की उसके साथ काम करने वाला उसका दोस्त घर से निकल रहा है। पहले तो नजरअंदाज करने जा रहा था लेकिन अचानक क्या हुआ की साकेत उसको फोन करता है और वो उसको लेने के लिए उसके घर आ जाता है। समय पर अपनी काम की जगह पहुंच जाता है। यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता।
फिर वो एक के बाद एक अपनी इच्छा पूरी करने में लग जाता है ।
जैसे उसकी ख्वाहिशें पूरी होती गई वैसे वैसे अहंकारी होता गया।
आज उसके पास खुद एक कंपनी है। करोड़ों रुपये, आलीशान बंगला, और हर सुख सुविधा है। आज उसे किसी की कोई जरूरत नहीं। बड़े ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा है। अचानक उसे वो बाबा याद आ गये। और हसते हसते सोचने लगा अगर वो साधु उसका इस्तेमाल कर लेता तो ऐसी जिंदगी वो भी जी पाता। साकेत को उस दिन की बात याद आई।
साकेत फौरन वहाँ के लिए निकला। वहाँ पहुंच कर उन्हें ढूंढने लगा। वह बाबा उसी मंदिर के एक कोने में उसी दिन की तरह बैठे हुए थे। उसे देखकर साकेत सोचने लगा। आज मैं कहाँ हूँ और यह बाबा आज भी यहाँ वहीं हालात में है।
साकेत उसके पास पहुंचकर बोला, " बाबा पहचाना, मैं वो इंसान हूँ जिसे आपने यह डायमंड दिया था।"
" जिसे यह रत्न दिया था, वह मुझे याद है लेकिन तुम्हें मैं नही जानता। खेर छोड़ो, कैसे आना हुआ? "
" आप से कहना था, आप को इस चीज की कोई खबर नहीं है। आज मैं इसकी वजह से कहाँ से कहाँ पहुंच गया। आप को अब पता चल ही गया होगा। अब तो आपको यह वापिस चाहिये होगा। "
" इस रत्न के बारे में पहले से जानता था। लेकिन तुम्हें देखकर अब यह बिल्कुल भी वापिस नही चाहिए। "
" मैं कुछ समझा नही। "
बाबा साकेत को लेकर एक कुंड पर पहुंचे और उसका चहेरा उसमें दिखाया। साकेत उसमें भयानक दानव जैसा दिख रहा था। बड़ा सा कठोर शरीर, पूरा बाल से ढका हुआ, लाल लाल आखें और बहुत धारदार नाखून। साकेत कुछ समझता उससे पहले बाबा बोले।
" पता यह क्या है? यह तुम्हारा अंतर्मन है।"
जानते हो यह कैसे हो गया?
जैसे जैसे तुम्हारी इच्छा पूरी होने लगी तुम में अहंकार आ गया। तुम तुम्हारे सामने सबको छोटा समझने लगे। आज इसी वजह से तुम्हारे साथ कोई नही है। "
" हमारे अंदर अच्छाई और बुराई दोनों होती है। लेकिन यह हम पर निर्भर करता है की हम किसे बढ़ावा देते हैं। "
