रंग मंच

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गांव से शहर नृत्यांगना बनने आयी श्यामा आज बहुत खुश थी...आज उसका सपना पूरा होने वाला था। आज पहली बार हजारों लोग उसको देखेंगे....आज बिल्कुल अपनी गुरु रुक्मिणी देवी के जैसा ही श्रृंगार किया था उसने। वही लाल साड़ी, कंगन, झुमके, मांगटीका, गजरा और सबसे प्रिय वो जड़ाऊ हार ... कितनी मेहनत कितना इंतजार किया था उसने इस दिन का....अपनी मां से लड़कर कुछ महीने पहले शहर आयी श्यामा आज ग्रीन-रूम में अपनी पारी के इंतजार में बैठी थी। मां से अपनी खुशी बांटना चाहती थी वो, बताना चाहती थी कि आज वो नामचीन नृत्यांगनाओं में गिनी जाने लगी है.... मां को बताने के लिए उसने कागज और कलम हाथ में लिया ही था .....कि उसका नंबर आ गया और वो अपनी परफॉर्मेंस देने के लिए मंच पर पहुंची, जैसे ही पर्दा उठा सामने वीआईपी सीट पर अपनी मां को बैठे देख श्यामा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने अपना परफॉर्मेंस पूरी शिद्दत से दिया और पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। रुकमणी देवी ने मंच पर आकर माइक लेकर कहा मैं ने गुरु होने के नाते इसको सारे भाव सिखाए मगर इसकी आंखों में जो एक चमक कमी थी वो आज श्यामा की मां ने मेरे निवेदन पर यहां आकर पूरी कर दी।


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