राजनीति पर लेख।
राजनीति पर लेख।
अपनी कक्षा विषयों पुस्तक के शिक्षा के साथ- साथ मुझे शुरू से ही राजनीति से जुड़ी बातों में अत्यंत रुचि रही है।
मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरी यह रुचि किसी विशेष महत्व की और संकेत करती है।
वास्तव में राजनीति में व्यावहारिक रुचि को मैं चिंतनशील प्राणी के मौलिक दायित्व का अंश मानता हूँ।
मेरा यह विश्वास है कि जिन्हें अपने आसपास की राजनीतिक दुनिया की समझ नहीं, उन्हें आलोचना या शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है।
इसलिए अब मैं राजनीतिक विषयों के बारे में काफी अध्ययन करता हूँ , परंतु मेरे अध्ययन का महत्व संभवतः: तथाकथित बुद्धिजीवियों के आम जन की समझ में सर्वथा भिन्न है।
मैं उन लोगों को जानता हूँ जो एक पुस्तक के बाद दूसरी पुस्तक के पृष्ठ-के-पृष्ठ पढ़ जाते है, लेकिन फिर भी उन्हें पढ़ाकू नहीं माना जा सकता।
कारण स्पष्ट है, ऐसे लोग भले ही बहुत कुछ जानते हो, परंतु उनका मस्तिष्क पुस्तकों में निहित सामग्री के संकलन और वर्गीकरण करने में सक्षम नहीं होता।
उनके पास इतनी क्षमता नहीं होती कि वे किसी पुस्तक की उपयोगी और अनुपयोगी सामग्री में अंतर कर सके, पढ़ते समय आवश्यक को मस्तिष्क में संभाल कर रख सके और अनुपयोगी को छोड़ सके।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अध्ययन अपने आप में अंत नहीं, अपितु यह ध्येय-प्राप्ति का एक साधन है, इसका मुख्य उद्देश्य उस ढांचे को मजबूत करना है, जो प्रत्येक व्यक्ति के भीतर विद्यमान गुणों और योग्यताओं से मिलकर बना है।
इस तरह प्रत्येक प्राणी अपनी लिए उन साधनों और सामग्री को जुटाता है, जो उसके जीवन को आनंदमय बिताने के लिए आवश्यक होते है।
चाहे फिर यह काम दैनिक जीवन के लिए रोटी कमाने का हो या उच्च मानवीय आकांक्षाओं कि पूर्ति का प्रयास हो। अध्ययन का यही पहला उद्देश्य
है।
इसका दूसरा उद्देश्य है, अपने चारों ओर के संसार का सामान्य ज्ञान प्राप्त करना।
दोनों उद्देश्यों के लिए अध्ययन के द्वारा प्राप्त ज्ञान को पुस्तक के क्रमानुगत अध्यायों कि भाँति इकट्ठा नहीं करना चाहिए, बल्कि अर्जित ज्ञान के छोटे-से-छोटे हिस्से को भी समीक्षा द्वारा ऐसे संभालना चाहिए जैसे वास्तुकार छोटे से छोटे टुकड़े को भी संभाल कर रखता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसे अन्य टुकड़े और कनों में उचित स्थान मिल सके।
ज्ञान के इसी विश्लेषण से इंसानों को अपने मस्तिष्क में संसार का एक सामान्य चित्रण बनाने में मदद मिलती है, अन्यथा ऐसे समग्र अध्ययन से केवल अवस्थित धारणाओं को उलझाने वाला जमघट इकट्ठा हो जाता हैं।
यह उलझन ही अभागे अज्ञानी को अहंकारी बना देती है।
बात यह है कि ऐसे व्यक्ति आपने आप को अत्यंत शिक्षित समझने लगते है। वह समझते है कि अब वह जीवन की वास्तविकता को समझने लगे। वह मानते है कि उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जबकि सच्चाई यह होती है कि ऐसे व्यक्ति के ज्ञान में जितनी वृद्धि होती है, वास्तविक जीवन में वह उतना ही दूर होते चला जाते है और अंततः किसी आरोग्य आश्रम मे पहुँच जाते है या राजनीति में प्रवेश करके छुटभैया स्तर का राजनेता बन जाते है।
मेरी निश्चित मान्यता है कि तर्क-वितर्क कर सत्य-असत्य का विश्लेषण न करने वाले व्यक्ति उचित अवसर आने पर संचित ज्ञान का सही उपयोग नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी मानसिकता जीवन की परेशानियों का सामना करने के अनुकूल नहीं होती।
उनके मस्तिष्क में ज्ञान उसी क्रम में शब्दश:संचित हुआ होता है, जैसे उन्होंने पुस्तकों से ग्रहण किया होता है और यदि उन्हें किसी दिन भाग्य से जीवन के व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए उस पुस्तक ज्ञान कि जरूरत पड़ जाए, तो उन्हें पुस्तक का नाम और उसका पृष्ठ बताना पड़ेगा, क्योंकि वह बेचारे मुर्ख तो वो स्रोत भी नहीं बता पाएंगे जहाँ से उन्होंने यह जानकारी प्राप्त कि थी, परंतु उलझन की उस स्थिति में यदि पृष्ठ
कि जानकारी मिल पाई, तो उस बहुपठीत बुद्धिजीवी को अत्यंत लज्जित होना पड़ेगा।
उत्तेजना कि इस भयावह स्थिति में वह या तो अपने बचाव के सहारे खोजेंगे या फिर उद्दंडता का मार्ग अपनाएंगे।
इस प्रकार यह निश्चित है कि अन्त में वह गलत आचरण ही करेंगे।
