Swati Rani

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नसीहत

नसीहत

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"पति के सामने खाना मत, पति को अपना दर्द मत बताना, पति को मायके के भेद मत बताना, पति को अपने एकाउंट मत दिखाना"रजनी आंटी अक्सर मोहल्ले की लड़कियों को ये सीख देते रहती थीं।

" ओहो आंटी हम आजकल कि माडर्न लड़कियाँ है, पैर दबवाऐंगी पति से, पल्लु से बंध के रहेगा वो हमारे, आप लोग का जमाना कुछ और था,तब औरतों को सहना पड़ता था", कहकर हम लड़कियां मजाक उड़ा देती थी उनका।

" बेटा। चाहे कोई भी युग हो पति तो पति होता है ", रजनी आंटी समझाती थी।

 हम लड़कियाँ हरदम उनकी इस बात पर हँसती थीं और कभी ध्यान नहीं देती थीं, न कभी जानने की कोशिश करती थीं कि वो ऐसा क्यों बोलती हैं, बस सोचती शायद वो खुश नहीं है अपनी शादी से।


 युवावस्था में शायद ही कोई लड़की होती होगी जिसने अपने शादी का सपना नहीं देखा होगा। बड़े सुंदर सपने होते हैं वो पर ज़्यादातर लड़कियों के सपनों की दुनिया की बनावट पति और उसके संग बिताने वाले पलों की कल्पना से ही बुनी होती है, ऐसे में अगर, पति के सामने मत खाओ, पति को अपना दर्द मत बताओ, अपने मायके का भेद मत बताओ और एकाउंट मत बताओ वगैराह कहा जाए तो सपनों के घरौंदे की बनावट का महत्वपूर्ण ईंटा तो निकल ही जाएगा, उस कल्पना का क्या होगा, जिसमें रूठ जाने पर होने वाला पति, प्यार से मना कर अपनी पत्नी को अपने हाथों से खिलाता है और वो नखरे कर, इठला कर, अहसान करने के अंदाज़ में, बड़ी अदा से, नज़ाकत से खाती है।

 उस ख़्वाब का क्या होगा, जब सिर में दर्द होने पर सपनों का राजकुमार, अपने हाथों से माथे पर बाम लगाएगा और फरमान जारी करेगा कि, ' जानेमन, आज तुम दिन भर आराम करना, घर और बच्चे मैं देखूंगा, आज तुम्हारी काम की छुट्टी। 

उन सपनों का क्या होगा जब दोनों थके-मांदे काम से आएँगे और रात में एक दूसरे के आगोश अपने पूरे जीवन कि व्यथा कहेंगे।

हममें से कुछ तो सोचती थी एक- एक बात बताएंगे पति को, आखिर वो नहीं तो कौन समझेगा, शुरू से तो घर-परिवार में लड़की होने के नाते भेद-भाव झेला ही था।

और एकाउंट भी क्यों ना बताये, पापा को तो कई बार अपने पैसे देने चाहें है वो तो नहीं लेते फिर हमारा सपने का राजकुमार तो स्वावलंबी होगा, लालची थोड़े ना होगा।

अब बताइए, ऐसे मधुर ख्वाबों की दुनिया में, रजनी आंटी की ये नसीहतें, भला किसको पसंद आतीं, हम भी अक्सर एक कान से सुनते और दूसरे से निकाल देते। रजनी आंटी का नसीहतें देना और हम लड़कियों का यूं नसीहतों को नज़रअंदाज़ करना साथ साथ चलता रहा और बारी- बारी से अपनी पढ़ाई पूरी कर हम सब ससुराल पहुंचे, कुछ सहेलियाँ संयुक्त परिवार में ब्याही गईं तो कुछ को पति के साथ अकेले संसार बसाने का मौका मिला।


 आज सालों के बाद हम सब सहेलियाँ अपने मायके को आईं हैं और आपस में मिल बैठने का अवसर मिला है, हम सब बहुत खुश हैं, इतने दिनों बाद पुरानी सखियों का साथ पाकर और पुरानी यादों को ताज़ा कर ।

"और सुनाओ, कैसी कट रही है हमारे जीजाजी के साथ?" हम सबने राशी को छेड़ा। राशी हममें सबसे सुंदर और बुद्धिमान लड़की थी, जिसे खाना बनाना, सिलाई कढ़ाई सब में महारथ हासिल था, उसके सपने देखने की आदत भी हम सब से ज़्यादा थी, जिसका सपना सिर्फ और सिर्फ पति और उसका घर संसार था, मेरी और मेरी एक दो सखियों के सपनों में नौकरी भी शामिल थी, गृहस्थी के साथ। हम सब अपने-अपने सपनों को साकार होता देख रहे थे, बातों बातों में रजनी आंटी की चर्चा निकल आई। 

अंजली ने कहा " याद है? रजनी आंटी कैसे "पति के सामने खाना नहीं, पति को दर्द बताना नहीं वगैरह कहती थीं और हम उनकी हँसी करते थे।

" हां, वो भी क्या दिन थे", बातें करते करते अचानक राशी की आंखे भर आईं।

"अरे। क्या हुआ राशी?" 

हमारे सवालों के जवाब में वो बाकायदा सुबक के रोने लगी और कहा,"हां, रजनी आंटी सही कहती थीं।"

राशी को चुप कराते कराते हम सब के दिलों में यही बात चल रही थी, हां, वो सही कहती थीं।


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