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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Others


4  

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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मेरे पापा (4) ..

मेरे पापा (4) ..

11 mins 347 11 mins 347

माँ को, सुशांत से प्रभावित हुआ देख मैं, खुश हुई थी। माँ ने मुझे जलपान लाने को कहा था फिर स्वयं सुशांत के पास जा बैठी थीं। 

मैं रसोई में गई थी। ट्रे में जल के साथ, ड्राई फ्रूट्स, पाइन एप्पल जूस लेकर, बैठक कक्ष में गई थी। मेरी आँखे सुशांत को लेकर प्रेम एवं आदर की अनुभूति से झुकीं हुईं थीं। उनके तुलना में, स्वयं को, साधारण मानने से, हीनताबोध मेरे दिमाग में काम कर रहा था, इस कारण मेरे हाथों में थोड़ा कंपन था। 

मुझे कक्ष में आना सुशांत शायद, ध्यान से देख रहे थे। मेरे हाथों में कंपन उन्होंने देख लिया था। सुशांत झटपट उठे थे। मेरे हाथ से ट्रे लेकर, सेंटर टेबल पर रखी थी। साथ ही कह रहे थे - इतना सब एक साथ लेकर आने की, क्या जरूरत थी। 

मेरे मुहँ से अनायास ही सच निकल गया था। मैंने कह दिया -" मैं कुछ नर्वस सी हूँ, अभी। "

सुशांत ने शायद, मेरा आत्मविश्वास पुनः बनाने के विचार से कहा - "अरे, रमणीक दोनों की एक ही कहानी, मैं भी नर्वस, तुम भी नर्वस। "

इस पर मुझे हँसी आ गई थी। 

सुशांत ने साथ ही हँसते हुए, परिहास के लिए कहा - "यूँ हँसते हुए तो आप, मिस यूनिवर्स की दावेदार दिखाई पड़ती हो। "

मैंने भी परिहास के लिए प्रश्न किया - "आप, झूठ भी बोलना जानते हैं। "

इस पर माँ को हँसी आ गई थी, परंतु सुशांत ने मगर मजाक को गंभीरता की तरफ मोड़ दिया था - 

"नहीं, यह बात झूठ नहीं है। वास्तव में यह निगाहों एवं नज़रिये का अंतर होता है। किसी को कोई तो, किसी को कोई सबसे अच्छा एवं सुंदर दिखाई पड़ता है। मेरी दृष्टि में मिस यूनिवर्स भी, तुम्हारे सामने उन्नीसी है"। 

सहजता में अपनी बात कह देना भी, सुशांत में निराली कला थी। 

माँ ने पूछ लिया - "बेटा, मेरी निकी क्या, तुम्हें अच्छी लगती है? "

सुशांत ने कहा - "अच्छी ही नहीं, मेरी दृष्टि से ऑन्टी, आप देखेंगी तो, दुनिया में सबसे अच्छी।" 

मैंने अपने दिखने पर से चर्चा का केंद्र, हटाने के लिए, ट्रे से जूस एवं ड्राई फ्रूट्स की प्लेट, सुशांत की तरफ आगे की थी। प्लेट लेकर, टेबल पर रख, जूस का गिलास, सुशांत ने हाथ में लिया था। माँ ने भी जूस लिया था, जिसे जल्दी पीते हुए वे उठी थीं। बोलीं तुम दोनों बातें करो मैं रसोई का काम देखती हूँ। सुशांत ने झट उठकर माँ के हाथ पकड़ उन्हें सोफे पर वापिस बैठाया और कहा - 

"आंटी, आप बैठिये। मेरी मम्मी ने बताया है कि रमणीक, बहुत स्वादिष्ट भोज बनाती है। मैं, रमणीक के बनाये भोजन का आनंद लेना चाहता हूँ। रमणीक, रसोई का काम कर लेगी। आप और मैं बातें करेंगे।"

इस पर मैंने कहा-" हाँ माँ, मैं रसोई का काम करती हूँ। यह कहकर मैं उठी थी और रसोई की ओर जाने लगी थी। सुशांत ने तुरंत उठकर, बिना किसी संकोच के इस बार, मेरे दोनों हाथ थामे, एक प्रकार से खींचते हुए, मुझे सोफे पर बिठाया बोले - "नहीं, खाने की इतनी जल्दी भी नहीं है। "

सुशांत में फौजी, अनुरूप चपलता थी। मैंने दो बार में उन्हें पलक झपकते बैठे से, उठ खड़े होता देखा था। 

ट्रे के तरफ इशारा करते हुए वे बोल रहे थे - इतना सब मैं, अकेला खत्म नहीं कर पाउँगा, मेरा साथ दीजिये। हमें, परस्पर साथ देने की आदत, अभी से डाल लेनी चाहिए। 

उनके हाथों के प्रथम स्पर्श को मैंने अनुभव किया था। मुझे, ऐसा अनुभव हुआ कि यही वह बात थी, जिसके बिना मेरे जीवन में अधूरापन था। इस पल मुझे, यूँ लग रहा था, जैसे जीवन से मुझे, अब और कुछ नहीं चाहिए। फिर अपनी तरफ ही, माँ एवं सुशांत की दृष्टि देख, मैंने अपने भाव छुपाने का असफल प्रयास किया था। 

मुझे सहज करने के लिए सुशांत फिर उठ गए थे। इस बार ट्रे लेकर, मेरी तरफ जूस एवं प्लेट बढ़ाई थी। मुझे भी यही उपाय ठीक लगा था। जिससे मैं, अपने मनोभाव नियंत्रित करूँ। मैं प्लेट में से, जल्दी जल्दी खाते हुए, जूस पीने लगी थी। सुशांत ने मेरी मनः स्थिति समझी थी। वे प्रकट में, माँ से बतियाने लगे थे। वे क्या बात कर रहे हैं, उस पर ध्यान न देकर जलपान जल्द खत्म कर, मैं उठी थी। इस बार सुशांत ने कुछ नहीं कहा था। आत्मीय दृष्टि से, मुझे रसोई की ओर जाते बस देखा था। 

फिर मैं रसोई में एवं बैठक कक्ष में, माँ एवं सुशांत बातों में, व्यस्त हुए थे। रसोई पहले ही अधिकतर तैयार थी। अतः अपनी जिज्ञासा में, बीच बीच में अपने कान उनकी बातों पर दे रही थी। सुशांत ने ना जाने, क्या पूछा था जिस पर अभी माँ, कहती हुई सुनाई पड़ रही थी - 

"मैंने, दुःखद अकेलापन देखा है, बेटे। रमणीक स्कूल भी पूरा नहीं कर पाई थी कि मेरे पति, मेरी बेटियों के पापा, चले गए थे। बेटियों के जीवन में ऐसा भयानक सा अकेलापन नहीं आये, यही भय मुझे, सताता रहता है। रमणीक के लिए, तुम जैसा लड़का कोई नहीं मिलेगा मगर बेटा, तुम्हारा फौजी होना, मेरे सामने दुविधा खड़ी करता है।" 

माँ चुप हुईं थीं। मेरी जिज्ञासा बढ़ गई थी कि सुशांत की प्रतिक्रिया, क्या होती है? वे उत्तर में क्या कहते हैं?सुशांत कह रहे थे - 

"ऑन्टी, जो दुःखद बात हमारे साथ होती है। वह, हमें इतना भयाक्रांत करती है कि हर घड़ी में हम, उसकी छाया अपने हृदय पर अनुभव करते हैं। जो बात एक बार घट जाती है वह, बार बार फिर नहीं घटा करती किंतु ऐसा फिर होने की आशंका, हमें सताती रहती है। रमणीक आपकी बेटी है, उसे लेकर आपकी, यह चिंता मैं, समझ सकता हूँ। इस पर मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि रमणीक, मेरी पसंद होना एक बात है। वही मेरी पत्नी हो, यह बिलकुल अलग बात है। अगर आप, इतनी चिंतित हैं तो मेरा एक अत्यंत करीबी मित्र, बॉलीवुड में है। वह ख्याति प्राप्त है। शायद आपने भी उसे देखा एवं सुना होगा। आप कहें तो, रमणीक के लिए मैं उससे बात करता हूँ।" 

यह सुनकर मेरा हृदय बैठने को हुआ। मुझे लगा माँ ने बहुत जटिल समस्या खड़ी कर दी है। मैं एकदम जड़ हो, अवाक खड़ी रह गई। तब माँ के प्रतिरोध का स्वर सुनाई दिया - 

"नहीं नहीं बेटा, मेरा यह आशय नहीं है। मेरे लिए बॉलीवुड एकदम अनचाही जगह है। ना बाबा ना मैं, बॉलीवुड के लड़के से, वह चाहे जितना, विख्यात और धनवान हो, रमणीक की शादी नहीं करा सकती। "

सुशांत ने पूछा - "ऐसा क्यों, ऑन्टी? "

माँ ने बताया - 

"मेरा मानना है कि जितना नेम-फेम देश ने, इस इंडस्ट्री के लोगों को दिया। उन्होंने, देश से मिले उन पर, उपकार को अनदेखा किया है। उन्होंने, अपने दायित्वों को नहीं समझा एवं बिलकुल उलट काम किया है। दिखाने को तो इंडस्ट्री में नारी को, प्रमुखता दी जाती है। मगर वास्तव में वहाँ, उनमें से अनेकों का, कामुकता से शोषण किया जाता है। 

बॉलीवुड के लोगों की हमारे प्रति दायित्वहीनता ने, नारी के प्रति समाज में, पुरुष की दृष्टि ही बदल दी है। सिनेमा आने के पहले पास पड़ोस में जिन्हें, माँ-बहन एवं बेटी के आदर से देखे जाने की हमारी संस्कृति थी। सिनेमा के अनेक निकृष्ट प्रसारण से, उन्हें अब समाज में, कामुक दृष्टि से देखा जाने लगा है।" 

यह सुन मुझे चैन मिला। मुझे यूँ प्रतीत हुआ कि माँ के मुख से, मेरे पापा के स्वर प्रस्फुटित हो रहे हैं। उन्होंने, वे ही बातें कहीं थीं, जिन्हें कहकर मेरे पापा, दीदी एवं मुझे बुराइयों में पड़ने से विमुख, रखा करते थे। मैं रसोई के तरफ कम ध्यान देकर, बाहर की जा रही बातें, अधिक दिलचस्पी से सुन रही थी। 

सुशांत ने इस पर कहा - "ऑन्टी, बॉलीवुड के बारे में आपने सटीक कहा है। "

सुशांत की अपनी बातों से सहमति देख, माँ ने कहा -

"सिने इंडस्ट्री को देश वासियों ने जितना पैसा दिया, उससे धनी होकर वहाँ की शोमैनशिप ने आडंबर दिखा दिखा कर हमारे लोगों के, आडंबर पर किया जाने वाला, और इस तरह हर घर का, खर्च (बजट) बढ़ा दिया है। अपने प्रशंसक बढ़ाने की जुगत में अपने विभिन्न लज्जाहीन स्कैंडलों के प्रसारण से, इन्होने बच्चों को उलझाया है। फलस्वरूप पिछली पीढ़ियों में, अनेक बालमन, अध्ययन से भटका एवं व्यसनों में पड़ा है। "

सुशांत लगता है माँ से सुनी बातों से प्रभावित हुआ था उसने, माँ के विचारों को और जानने की नीयत से कहा -" वाह, ऑन्टी कम शब्दों में आपने, सुलझी बातें कहीं हैं। मैं, सेना के बारे में, आपके विचार भी जानना चाहता हूँ। "     

माँ ने अपनी प्रशंसा से, उत्साहित होकर कहा -" हमारी सेना में कार्यरत हर बेटे-बेटी तो देश के वास्तविक नायक हैं। जिन्हें छद्म नायकों से, बहुत कम पैसा एवं प्रसिध्दि मिलती है। तब भी ये, वीरता के वो कारनामे कर दिखाते हैं जो देश के लिए, अत्यंत गर्व की बात होती है।"

अब सुशांत ने ख़ुशी में कहा - 

"आप देश की सेना के लिए इतना सम्मान रखती हैं। सेना में होने से, मेरे लिए यह गौरव एवं प्रसन्नता की बात है। रमणीक से विवाह को लेकर, मुझे कोई जल्दी नहीं है। आप अच्छे से सोच समझ लीजिये। आपकी ना भी, हम दोनों परिवार के रिश्तों में कोई कटुता की बात नहीं होगी।" 

सुशांत की इस बात से, माँ घबरा सी गईं लगती थीं उन्होंने तुरंत सफाई जैसे दी थी - 

"बेटा, मैंने तुमसे रिश्ते को मना नहीं किया है। बस अपनी चिंता ही बताई है। तुम समझो बेटा, रमणीक 11 वर्षों से बिन पिता की बेटी एवं मैं, उसकी ऐसी अकेली माँ हूँ।" 

मुझे माँ का यह उत्तर राहत देने वाला लगा। सुशांत भी बुद्धिमान थे। वह माँ को दुख नहीं देना चाहता था अपितु एक बेटे जैसी भावना से उनको संबल प्रदान करना चाहते थे। उत्तर में अत्यंत विनम्रता से उन्होंने कहा - 

"ऑन्टी, समाज में दो बेटियों की अकेली माँ का जीवन कितनी चुनौतियों भरा होता है, इसे समझते हुए ही मैंने अपनी बात कही थी। अपने मित्र की चर्चा भी आपकी कठिनाई कम करने के लिए की थी। आपने उसमें रूचि ना लेकर यही सिध्द किया है कि आप रमणीक के लिए धनवान की अपेक्षा, विवेकवान रिश्ते को महत्व देती हैं, है ना?"

माँ ने, सुशांत से सहमति जताने में देर नहीं की थी, तपाक से बोलीं थीं - 

"हाँ बेटा, साथ ही यह भी कि तुम जैसे विवेकशील कम ही लड़के होगें। तुम तो लाखों में एक हो। दरअसल मेरे अपने भय से, मैं स्वयं ही परेशान हूँ। "

अब सुशांत का स्वर समझाने वाला हुआ था वह बोला - 

ऑन्टी, अब यह बात पुरानी हो गई कि हमारे समाज में नारी, पति के ना रह जाने पर अकेली हो जाती थी। आज हो रहे कई विवाह, कुछ ही समय में टूट जाते हैं तब भी वह अकेली होती है। अकेली रह गई ऐसी माँ, अपने बच्चों को पालने से पहले, उनको अपने पास रखने के लिए नयायालय में जूझती है। फिर उन्हें लालन पालन में कठिनाई होती है। 

मेरा कहने का अभिप्राय यह है कि रमणीक का मुझसे विवाह होने से, उस पर विवाह टूटने का खतरा कभी न होगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आजीवन उसे अकेली ना पड़ने दूँगा। आपको दुविधा में देखना, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। आप पूरी तरह सुनिश्चित हो लें। मैं विवाह के लिए देश पर अभी मंडरा रहे युध्द के बादल, छँटने तक प्रतीक्षा कर लूँगा। यह सुनकर मैं, माँ क्या कहती हैं, इसे सुनने की जिज्ञासा में, ट्रे उठाने के बहाने से बैठक में आई थी। देखा तो मुझे लगा जैसे माँ, अब सुशांत की फैन हो गई थीं। 

उन्होंने अचरज में, ऊपर से नीचे तक सुशांत को देखते हुए कहा था - 

"बेटा, तुम अपनी उम्र से ज्यादा, अनुभव की कहते हो। तुम्हारी अनूठी यह योग्यता अब, मुझे प्रतीक्षा नहीं करने देगी। मेरे हृदय में तुमसे, निकी के रिश्ते को लेकर अब कोई संशय नहीं रह गया है।" 

यह सुन मैंने, अपने मुख को विपरीत दिशा में करके, अपनी प्रसन्नता छुपाई थी और मैं शीघ्र रसोई में वापिस आ गई थी। आगे की बातें सुनने में, मुझे अब कोई रूचि नहीं रह गई थी। मैं अब ध्यान रसोई में केंद्रित करना चाहती थी ताकि सुशांत को भोजन में स्वाद, अच्छा लगे। 

फिर भी मुझे सुनाई दे गया था, सुशांत कह रहे थे - 

"मेरे पापा, मेरे बचपन से ही मुझे, कहते आयें हैं, जो तुम्हारे साथ घटता है, सिर्फ उतने से ही तुम्हे, सीखना समझना नहीं है। अपितु जीवन में ज्यादा सफल होने के लिए, हमारे अनुभवों से सीखना और समझना है। मेरी अच्छी बात का श्रेय, मेरे पापा-मम्मी को है जिन्होंने, अपने से ज्यादा, मेरे जीवन पर ध्यान रखा है। "  

फिर लगभग बीस मिनट बाद सुशांत, अकस्मात रसोई में आये थे, पीछे पीछे माँ भी आईं थीं। सुशांत, मुझसे पूछने लगे थे कि -" मैं, आपकी कुछ सहायता करूँ? थोड़ा कुछ रसोई का काम, मुझे भी आता है।" 

इस पर माँ हँसी थी। मैंने परिहास में कहा - "अभी रहने दीजिये। इस ज्ञान के प्रयोग को, आगे के लिए बचाये रखिये। "

मेरी बात पर, सुशांत ने खिलखिला कर हँसते हुए, माँ से कहा - 

"ऑन्टी, रमणीक की इस प्यारी बात पर मैं चाहता हूँ कि यदि आपको, आपत्ति ना हो तो मैं, इन्हें अपने साथ, पास ही के, ध्रुव बत्रा पार्क की सैर पर ले जाऊ। "

माँ ने स्नेह से कहा - "हाँ हाँ बेटे क्यों नहीं! जाओ, तुम दोनों भी आपस में बात करो। एक दूसरे को जानो।" 

फिर माँ ने मेरे तरफ मुखातिब हो कहा - 

"निकी, तुम कपड़े बदल लो। मैं, तब तक टिफिन में खाना पैक कर देती हूँ। तुम दोनों वहीं साथ खाना एवं साथ बतियाना। कहते हुए वे ख़ुशी से मुस्कुराए जा रहीं थीं।" 

सुशांत इससे खुश हुए, मजाक करते हुए बोले थे - "ऑन्टी, बहुत प्यारा आइडिया है आपका, सैर, पिकनिक और पहली पहली प्यार की बातें, थ्री इन वन, हो जायेगा।" 

इस बात से मेरे मुखड़े पर, लाज की लालिमा आ गई थी। मैं दोनों को रसोई में छोड़, चेंज के लिए अपने कमरे में आई थी। अब अत्यंत प्रसन्नता से, अपना सबसे पसंदीदा परिधान मैं पहनने एवं श्रृंगार करने लगी थी।               


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