Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.
Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Others


2  

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Others


मैं …

मैं …

4 mins 72 4 mins 72

शतरंज होता क्या है? यह दिमाग का वह एक खेल है जिसमें हमारा प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी अपनी चालों में, हमारे मोहरों को घेरने की कोशिश करता है। यदि पलट खेल में हम उसके मोहरों को नहीं उलझाते हैं तो फिर हम उसकी चालों में घिर कर विवश हो जाते हैं। फिर हम अपना बचाव करते हुए वे चाल चलते जाते हैं जिसे चलने के लिए प्रतिद्वंद्वी बाध्य करता है। 


विश्वनाथन आनंद को भी हराया जा सकता है यदि हम, शतरंज सीखने एवं खेलने में समर्पित भाव से जुट जाएं। मगर जब हमसे खेलने बैठा प्रतिद्वंद्वी ‘समय’ हो तो हम उसके साथ अपनी कोई चाल नहीं चल पाते हैं। वरन वह चाल चलते हैं जिसे चलने के लिए ‘समय’ हमें बाध्य करता है। ‘समय’ बड़ा चतुर और चालबाज होता है। वह हमसे खेलने में कई बार हमें यह भ्रम देने में सफल होता है कि उसके सामने हम, सब अपनी चला पा रहे हैं। समय द्वारा चतुराई से हमें दी गई अनुकूलताएं अगर सच भी होती हैं तो वह अस्थाई ही होती हैं। अंततः समय अपनी चाल में हमें घेर ही लेता है। 


वारासिवनी जैसे छोटे कस्बे में जन्म लेने एवं बोध बुद्धि आने के बाद, पिछले पचास वर्षों में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मप्र छोड़ कर मैं कभी दक्षिण भाषी क्षेत्र में रहने हेतु हैदराबाद आ जाऊँगा। प्रमुख रूप से ग्रामीण वातावरण में पलते-बढ़ते मैं भी कुछ रूढ़ि एवं विचारों में कुछ संकीर्णता रख जीवनयापन किया करता था। तब मैं कोशिश करता कि अपने लिए एक घर, जबलपुर या भोपाल में क्रय कर लूँ। समय हर बार मेरी इस कोशिश को विफल करता जाता था। 


मेरे माता-पिता यद्यपि सुलझे विचारों वाले थे। फिर भी माँ के विचार, धर्म से अधिक प्रभावित थे एवं पिता (मदनलाल जैन) व्यवसाय की साख और उसमें नैतिकता को प्रमुखता देते थे। 


उनके संस्कारों एवं अपने विवेक से, मैंने बाद के जीवन में बहुत सी रूढ़ियाँ एवं वैचारिक संकीर्णता दूर कर लीं थी। मगर शायद बीस वर्ष पूर्व तक, नारी-पुरुष में अत्यंत भेद करने वाली समाज दृष्टि से, मेरे भी विचार प्रभावित रहे थे। तब अपनी बेटियों के भविष्य को सोचते हुए अगर मैं उन्हें अर्निंग होते भी देखना चाहता था तब भी उन्हें टीचर या प्रोफेसर के जॉब अथवा अपने पति कुल की व्यावसायिक गद्दी पर बैठाने की सोचता था। तब मेरी संकीर्ण दृष्टि बेटियों का भविष्य म प्र में ही देख पाती थी। 


‘समय’ निरंतर मेरे साथ खेल रहा था। बेटियों को मैं पढ़ने-बढ़ने के जितने भी अवसर दे रहा था वे उसमें अच्छा करते जा रहीं थीं। तब भी लगभग आठ वर्ष पहले तक मैं उनका जॉब और विवाह करना म प्र में ही सोचता था। अपनी दृष्टि, अपने विचार तथा अपने इन पूर्वाग्रहों के बाद भी, मैं ‘समय’ की चाल में चलता रहा था। 


अब ‘समय’ ने मुझमें वृहत् विचार देने, दूर दृष्टि देने एवं पूर्वाग्रहों को दूर करने वाले अनुभव प्रदान करने की गति बढ़ा दी थी। 


मैं पच्चीस वर्ष पहले क्या सोचता और करता था। ‘समय’ की चालों में फंसकर उससे बहुत अलग करने सोचने लगा था। यह उस तरह से हो रहा था कि टेबल टेनिस में प्रतिद्वंद्वी की तेज गति अनुसार हमें भी तेज खेलना और तेज रिटर्न देना पड़ता है। 


मैंने ऐच्छिक सेवानिवृत्ति, अपनी बेड-रिडन माँ (चंद्रानी जैन) की सेवा करने की दृष्टि से ग्रहण की थी। मैं नहीं समझ पाया था कि यह भी ‘समय’ की ही एक चाल थी। मेरी सेवानिवृत्ति के साथ कोरोना आ गया। मैं, सेवानिवृत्ति के बाद पहले माह में भोपाल सेटल हो जाना चाहता था। अपनी माँ को अपने पास रहने के लिए लाने वाला था। ‘समय’ की चाल में पूरा माह भी नहीं बीत पाया था। माँ ने चिर विदा ले ली थी। 


अब जबलपुर से भोपाल आने का मेरा कोई प्रयोजन नहीं बचा था। बच्चों की, हमसे दूर रहकर कोरोना में, हमारे लिए चिंताएं बढ़ गई थीं। बेटियों एवं दामादों ने मिलकर हमारे लिए हैदराबाद में रहना तय कर दिया था। इस तरह, जो एक घर मैं अपना चाहता था, वह मेरे जन्मस्थान से 600-700 किमी दूर बन पाया है। 


‘समय’ अजेय खिलाड़ी है। इसका खेल अजीव एवं जीव दोनों के साथ अलग है। अजीव को तो यह रूप, आकार या स्थान परिवर्तन के साथ इसी लोक में रहने देता है। मगर मनुष्य सहित सभी छोटे बड़े जीवों को लील कर यह परलोक पहुँचा देता है। 


हम सब ‘समय’ के साथ खेलने को विवश हैं। इस खेल में यह हमें अनुकूलता या प्रतिकूलता जो भी दे मगर अंतिम परिणति, सबको एक जैसी ही प्रदान करता है। 


शतरंज के खेल का ‘विश्वनाथन’ जैसा खिलाड़ी भी इस ‘समय’ नाम के विश्वनाथन से हार ही जाता है। 


हम अपनी इस हार का विचार करते हुए, साहस एवं नैतिकता की चाल ही ‘समय’ के साथ चलें तो अंत में हमें संतोष मिलता है .....       



Rate this content
Log in