लोमड़ी की अदालत और आवारा गीदड़
लोमड़ी की अदालत और आवारा गीदड़
एक बहुत ही घने, हरे-भरे और सुंदर जंगल में एक हिरनी अपनी प्रिय सहेली बकरी के साथ रहती थी।
वह दोनों अपनी ज़िंदगी बहुत खुशी से बिता रही थीं और सुबह होने का बेसब्री से इंतज़ार करती थीं।
सुबह होते ही, हिरनी और उसकी सहेली बकरी जंगल के छोटे-छोटे बच्चों के साथ मिलकर उछल-कूद करतीं, खेलतीं और बेहद मज़े करती थीं।
वे खेलते-खेलते जंगल की ताज़ा घास और हरी पत्तियां चरतीं और खुशी-खुशी अपना पेट भरती थीं।
खूबसूरत हिरनी, बकरी और जंगल के बच्चे एक-दूसरे के साथ बेहद खुश और संतुष्ट जीवन जी रहे थे।
एक दिन, दूसरे जंगल से एक आवारा और धूर्त गीदड़ भटकता हुआ उनके जंगल की तरफ आ गया।
घूमते-घूमते उसकी नज़र उस खूबसूरत हिरनी पर पड़ी। हिरनी और बकरी जंगल में जहां भी जातीं, वह आवारा गीदड़ उनके पीछे-पीछे चलने लगा।
वह छिपकर, झाड़ियों के पीछे से हिरनी को लगातार घूरता रहता था।
हिरनी ने मन ही मन सोचा, "यह दूसरे जंगल का गीदड़ यहाँ क्यों घूम रहा है? शायद यह भी हमारे और बच्चों के साथ खेल-कूद कर अपना समय बिताने आया है।"
शुरू में उसने गीदड़ के घूरने को अनदेखा कर दिया और रोज़ की तरह अपनी सहेली व बच्चों के साथ खेलती-कूदती रही। शाम होने से पहले, वे सब खुशी-खुशी अपनी गुफाओं की ओर लौट जाते थे।
लेकिन गीदड़ का रोज़ आना और हिरनी को लगातार घूरना जारी रहा। उसकी गंदी और लगातार घूरने वाली नज़रों के कारण हिरनी की आज़ादी और सुकून छिन गया।
वह अब बहुत उदास और सहमी-सहमी रहने लगी। उसकी यह हालत देखकर एक दिन उसकी सहेली बकरी ने उससे पूछा, "मेरी प्यारी सहेली, मैं तुम्हें कई दिनों से बहुत दुखी और परेशान देख रही हूँ। क्या तुम किसी बड़ी उलझन में हो?"
हिरनी ने भारी मन से बकरी को अपनी परेशानी बताई, "बहन, वह दूसरे जंगल का आवारा गीदड़ हर रोज़ मुझे बहुत बुरी तरह घूरता रहता है। उसकी इस हरकत से मेरा यहाँ साँस लेना भी भारी हो गया है।"
बकरी ने उसे ढांढस बंधाया, "तुम ठीक कह रही हो, सहेली। कोई अजनबी इस तरह हमारी ज़िंदगी में दखल देगा तो हमारा सुकून खो जाएगा। तुम अपनी ज़िंदगी इस वजह से डरकर नहीं जी सकतीं। हमें इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी।"
बकरी अपनी सहेली हिरनी को न्याय दिलाने के लिए 'लोमड़ी की अदालत' ले गई। वहाँ उस आवारा गीदड़ पर केस दर्ज कराया गया।
अदालत में आवारा गीदड़ का केस भालू वकील लड़ रहा था और हिरनी की तरफ से गधा वकील पैरवी कर रहा था।
लोमड़ी जज साहिबा अपनी बड़ी कुर्सी पर बैठी थीं। उन्होंने अपना हथौड़ा चलाकर 'ऑर्डर-ऑर्डर' कहा और मुल्ज़िम गीदड़ का केस सुनना शुरू किया।
वकील भालू ने हिरनी को कटघरे में बुलाया और पूछा, "हिरनी, तुम इस गीदड़ पर केस क्यों कर रही हो? इसका क्या कारण है?"
हिरनी ने बहुत ही सहमी और धीमी आवाज़ में कहा, "जज साहिबा, जब मैं अपनी सहेली बकरी और जंगल के बच्चों के साथ खेलती-कूदती हूँ, तो यह दूसरे जंगल का आवारा गीदड़ लगातार मुझे घूरता रहता है। इसकी इस हरकत से मुझे अपने ही जंगल में बहुत घुटन महसूस होने लगी है।"
भालू वकील ने बात संभालते हुए कहा, "हिरनी जी, जब आप सब खेलते हैं, तो क्या आपकी नज़र भी इधर-उधर जाती होगी? क्या कोई ख़ास जानवर सिर्फ आपकी तरफ ही देख रहा है या आप केवल अंदाज़ा लगा रही हैं? गीदड़ तो बस वहाँ घूम रहा था।"
गधा वकील (हिरनी का वकील) तुरंत बीच में बोला, "जज साहिबा! यह बात सिर्फ देखने की नहीं है। किसी को इस तरह लगातार और बुरी नीयत से घूरना, जिससे वह असुरक्षित महसूस करे, अपराध है। गीदड़ की इस हरकत से हिरनी का जीना मुश्किल हो गया है।"
अदालत में बैठे सभी जानवर आपस में खुसर-पुसर करने लगे। कुछ का कहना था कि भालू वकील की वजह से बेचारा गीदड़ बेकसूर होते हुए भी फँस रहा है, तो कुछ हिरनी के समर्थन में थे।
तभी जज लोमड़ी ने शोर शांत कराया और गधे वकील से पूछा, "क्या आपके पास इस बात का कोई पुख्ता सबूत है कि गीदड़ सचमुच कसूरवार है? इस केस को आगे बढ़ाने के लिए हमें ठोस सबूत चाहिए।"
गधे वकील ने कहा, "जज साहिबा, मुझे बस एक दिन का समय दीजिए। मैं साबित कर दूंगा कि गीदड़ बेकसूर नहीं है।"
अदालत की एक दिन की छुट्टी हो गई। भालू वकील अपनी पत्नी को लेकर पास के एक बहुत ही खूबसूरत जंगल में घूमने गया। वह दोनों वहाँ के प्राकृतिक नज़ारों का आनंद ले रहे थे, तभी भालू की पत्नी को महसूस हुआ कि कोई अजनबी (जो कि काला कम्बल ओढ़े हुए था) लगातार उनका पीछा कर रहा है और उन्हें घूर रहा है।
भालू की पत्नी ने डरकर अपने पति से कहा, "हमें यहाँ एक मिनट भी नहीं रुकना चाहिए। चलो यहाँ से भागें!"
भालू ने हैरान होकर पूछा, "क्या बात है? तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?"
उसकी पत्नी ने इशारा करते हुए कहा, "देखो, वह काला कम्बल ओढ़ा अजनबी हमें कितनी बुरी तरह घूर रहा है। उसकी इस घूरती नज़रों की वजह से मेरा दम घुट रहा है। हम यहाँ खुशी-खुशी घूमने आए थे, लेकिन अब मुझे यहाँ बहुत असुरक्षित महसूस हो रहा है।"
यह सुनते ही भालू को तुरंत सब समझ आ गया। उसे अहसास हुआ कि जब उसकी पत्नी सिर्फ कुछ पलों के घूरने से इतनी डर गई, तो बेचारी हिरनी रोज़-रोज़ उस गीदड़ के घूरने से कितनी मानसिक प्रताड़ना झेल रही होगी।
अगले दिन अदालत में, भालू वकील ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा, "जज साहिबा, मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई थी। हिरनी बिल्कुल सच कह रही थी। किसी की लगातार घूरती हुई नज़रें किसी भी सीधे-साधे जानवर को
मानसिक रूप से बीमार और असुरक्षित कर सकती हैं। गीदड़ वाकई गुनहगार है।"
जज लोमड़ी ने सारी गवाही और भालू वकील के बयान को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया: "यह अदालत गीदड़ को दोषी करार देती है। दूसरों को डराने और उनकी स्वतंत्रता छीनने के अपराध में आवारा गीदड़ को जंगल की जेल में भेजा जाता है, जहाँ गोरिल्ला उसकी खबर लेगा।"
गीदड़ ने रोते हुए, हाथ जोड़कर अदालत से माफ़ी मांगी और कहा, "मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं आगे से कभी किसी भी बहन-बेटी या जानवर को गलत नज़रों से नहीं देखूँगा और सबका आदर करूँगा।"
इस तरह, जंगल में फिर से शांति छा गई और हिरनी व बकरी पहले की तरह आज़ादी और खुशी से जंगल में रहने लगीं।
