एक मिनट की उलझन
एक मिनट की उलझन
जंगल में जब भी किसी जानवर की तबीयत खराब होती, तो वह बूढ़ी गाय के पास इलाज के लिए आता था। बूढ़ी गाय जड़ी-बूटियों से दवाइयाँ बनाकर अपनी गुफा में रखती थी। उसके साथ दो बहुत ही शरारती बच्चे रहते थे—एक खरगोश और एक हिरण।
बूढ़ी गाय के साथ रहते-रहते दोनों बच्चों को भी जड़ी-बूटियों और दवाइयों की अच्छी समझ हो गई थी। जब भी बूढ़ी गाय किसी बीमार जानवर को दवा देने के लिए उठती, तो दोनों बच्चे तुरंत दौड़कर गुफा के अंदर जाते और दवा उठाने के लिए आपस में छीना-झपटी करने लगते।
फिर वे दवा लाकर बीमार जानवर को देते और कहते, "दवा पानी के साथ खाकर सो जाना, अब यहाँ से जाओ।"
बूढ़ी गाय दोनों बच्चों को बहुत डांटती और समझाती कि अपने से बड़ों का आदर-सम्मान करना चाहिए और उनसे बदतमीजी से बात नहीं करनी चाहिए। वह उन्हें यह भी सख्त हिदायत देती, "मेरी अनुपस्थिति में बिना पूछे किसी बीमार जानवर को दवा मत देना, वरना अनजाने में किसी बेकसूर की जान भी जा सकती है।"
जंगल के सभी जानवर बूढ़ी गाय का बहुत सम्मान करते थे और खरगोश व हिरण के बच्चों से भी बहुत प्यार करते थे। इस तरह बूढ़ी गाय और दोनों बच्चे जंगल के बाकी जानवरों के साथ खुशी-खुशी रह रहे थे।
एक दिन जंगल में घास-पत्ते चरते-चरते खरगोश और हिरण के बच्चे जंगल से बाहर खुले मैदान की तरफ भाग गए। बूढ़ी गाय भी उनके पीछे-पीछे भागी। खुले मैदान में बरगद का एक पुराना पेड़ था। दोनों बच्चे उसी पेड़ के नीचे आपस में शरारत करते हुए खेलने लगे।
हाथ-पाँव फुलाती हुई बूढ़ी गाय उनके पास पहुँची और उन्हें डांटते हुए समझाया, "इस खुले मैदान में कभी मत आया करो! अगर किसी शिकारी की नजर तुम पर पड़ जाती, तो वह तुम्हें उठाकर ले जाता। इसलिए आइंदा कभी जंगल से बाहर मत निकलना।"
बच्चों के पीछे दौड़ने की वजह से बूढ़ी गाय बहुत थक गई थी। उसने राहत की सांस लेने के लिए बस एक मिनट के लिए अपनी आँखें बंद कीं। लेकिन जैसे ही उसने आँखें खोलीं, दोनों बच्चे वहाँ से गायब थे! बूढ़ी गाय ने चारों तरफ देखा, पर दूर-दूर तक केवल खाली मैदान नजर आ रहा था; यहाँ तक कि आसमान में कोई पक्षी भी नहीं दिख रहा था।
बूढ़ी गाय घबरा गई और रात होने पर जंगल लौट आई। उसने जंगल के सभी जानवरों को बच्चों के गायब होने की पूरी बात बताई। यह सुनकर पूरा जंगल चिंता में डूब गया।
जंगल की बुद्धिमान लोमड़ी ने बूढ़ी गाय की बात बहुत ध्यान से सुनी—"बस एक मिनट के लिए आँखें बंद की थीं और आँख खोलते ही बच्चे गायब हो गए।"
जंगल के जानवरों ने लोमड़ी से कहा, "लोमड़ी बहन, इस एक मिनट की पहेली को तुम्हारे सिवा कोई नहीं सुलझा सकता। अगर तुम इसे हल नहीं कर पाईं, तो बूढ़ी गाय को उसके बच्चे कभी वापस नहीं मिलेंगे।"
लोमड़ी ने थोड़ी देर सोचा और जानवरों से पूछा, "क्या एक मिनट में कोई भी इतनी तेज़ भाग सकता है कि मैदान पार करके वापस जंगल आ जाए?" सभी जानवरों ने सिर हिलाकर 'नहीं' में जवाब दिया।
लोमड़ी तुरंत बोली, "जल्दी मेरे साथ चलो! दोनों बच्चे हमें उसी बरगद के पेड़ के पास ही मिलेंगे।"
सभी जानवरों को लगा कि शायद लोमड़ी का दिमाग खराब हो गया है, लेकिन वे फिर भी उसके पीछे-पीछे बरगद के पेड़ तक गए। वहाँ बरगद के पेड़ के पास ढेर सारे सूखे पत्ते पड़े थे। लोमड़ी ने जल्दी से पत्तों को हटाया, तो नीचे एक सूखा कुआँ दिखाई दिया, जिसमें दोनों बच्चे बेहोश पड़े थे। जानवरों ने तुरंत दोनों बच्चों को कुएँ से बाहर निकाला।
होश में आते ही दोनों बच्चे बूढ़ी गाय के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगे। बूढ़ी गाय ने भी उन्हें दुलारा और खुशी के आँसू बहाए।
बूढ़ी गाय ने लोमड़ी और जंगल के सभी जानवरों का दिल से धन्यवाद किया। इसके बाद बूढ़ी गाय, दोनों बच्चे, चतुर लोमड़ी और जंगल के सभी जानवर खुशी-खुशी अपने जंगल वापस लौट आए।
