सफेद गधे की तकलीफ
सफेद गधे की तकलीफ
सुबह की पहली किरण अभी आसमान में फैली ही थी। गाँव का वातावरण शांत और सुहावना था। हल्की ठंडी हवाएँ पेड़ों के पत्तों को सहलाते हुए गुज़र रही थीं और चिड़ियों की चहचहाहट से पूरा माहौल जीवंत हो उठा था।
गाँव के एक छोटे से मिट्टी के मकान के बाहर अमरुद का एक घना, हरा-भरा पेड़ खड़ा था। उसी पेड़ की ठंडी छाया में एक सफेद रंग का गधा भारी रस्सी से बँधा हुआ था।
परंतु, इस सुंदर प्राकृतिक दृश्य के बीच वह सफेद गधा बहुत पीड़ा में था। उसकी आँखों में बेबसी और थकावट साफ़ झलक रही थी।
उसकी पीठ पर असहनीय दर्द हो रहा था, जिससे उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं और वह रह-रहकर कराह उठता था। दर्द के मारे उसका शरीर काँप रहा था और चेहरा उदासी से ढका हुआ था।
तभी गाँव के पास वाले जंगल की पगडंडियों पर घूमता हुआ 'मोती' नाम का एक वफ़ादार कुत्ता वहाँ आ पहुँचा। मोती स्वभाव से बहुत ही दयालु और संवेदनशील था।
जब उसकी नज़र अमरुद के पेड़ के नीचे बेबस खड़े सफेद गधे पर पड़ी, तो उसकी चाल धीमी हो गई। उसने देखा कि गधा दर्द से तड़प रहा है।
मोती के चेहरे पर चिंता और सहानुभूति के भाव उभर आए। वह धीरे-धीरे चलकर गधे के पास गया और प्यार से अपनी पूँछ हिलाते हुए पूछने लगा, "गधे भैया! क्या हुआ? तुम इतने परेशान और दर्द से बेहाल क्यों लग रहे हो?"
सफेद गधे ने भारी मन और आंसुओं से भरी आँखों से मोती की तरफ देखा।
उसने अपनी गहरी साँस खींचते हुए तड़पकर कहा, "क्या बताऊँ मोती भैया! कल मेरे मालिक ने मेरी शारीरिक क्षमता का ज़रा भी ध्यान नहीं रखा। उन्होंने मेरी पीठ पर इतना भारी-भरकम बोझ लाद दिया कि मेरी कमर का जोड़-जोड़ दुख रहा है। कल से ही यह दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया है और मुझसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा। मेरे मालिक को मेरी इस हालत पर ज़रा भी दया नहीं आ रही।"
गधे का दर्दभरा किस्सा सुनकर मोती कुत्ते का चेहरा गुस्से और दुख के मिले-जुले भावों से भर गया।
उसने अपनी आँखें मूँद लीं और हमदर्दी जताते हुए कहा, "तुम्हारे मालिक के दिल में ज़रा सी भी इंसानियत नहीं बची है! अरे, जो किसी बेज़ुबान प्राणी का दुख और तकलीफ न समझ सके, वह कैसा इंसान? इंसान को तो भगवान ने समझने के लिए दिल दिया है, पर तुम्हारे मालिक का दिल तो पत्थर बन चुका है।"
दोनों बेज़ुबान जानवर जब एक-दूसरे से अपना दुख बाँट रहे थे, तभी थोड़ी ही दूरी पर मालिक की पालतू बिल्ली बैठी उनकी बातें सुन रही थी।
उस बिल्ली का रंग चमकीला था और वह बहुत ही चालाक तथा स्वार्थी स्वभाव की थी। उसकी आँखों में धूर्तता और ईर्ष्या की चमक साफ़ दिखाई दे रही थी। दोनों को बात करते देख वह मन ही मन कुढ़ने लगी।
बिल्ली ने अपने कान खड़े किए और मुँह बनाकर सोचने लगी, "अच्छा! तो यह गधा मोती कुत्ते के सामने अपनी लाचारी का ढोंग कर रहा है और मेरे बारे में शिकायतें कर रहा है! इसे जलन हो रही है कि मालिक और उनकी पत्नी-बच्चे मुझसे कितना प्यार करते हैं। वे मुझे अपनी गोदी में उठाकर पुचकारते हैं, मुझे कुर्सी और मेज़ पर बिठाकर बिस्किट, चॉकलेट और ताज़ा दूध खाने को देते हैं। यहाँ तक कि जब मैं बिस्तर या पलंग पर बैठती हूँ, तो वे जानवरों के प्रोग्राम टीवी पर लगाकर मुझे दिखाते हैं। और जब मालिक अपनी गाड़ी से बाज़ार या कहीं बाहर जाते हैं, तो मुझे शान से गाड़ी में घुमाने ले जाते हैं।"
ईर्ष्या और घमंड के मारे बिल्ली की आँखें छोटी हो गईं।
उसने दाँत पीसते हुए मन ही मन साज़िश रची, "अगर मैं इस कुत्ते और गधे को यहाँ से हटवा दूँ, तो मालिक मुझे ही सबसे ज़्यादा प्यार करेंगे! तब असली ज़िंदगी जीने का मज़ा आएगा।"
यह सोचकर बिल्ली के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई। उसने मोती कुत्ते और गधे को सबक सिखाने और मालिक से पिटवाने की नीयत से अचानक तेज़-तेज़ म्याऊँ-म्याऊँ चिल्लाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ इतनी तीखी और भयानक थी कि पूरे अहाते में गूँज उठी।
बिल्ली की तेज़ और कर्कश आवाज़ सुनकर गर्मियों की दुपहरी में घर के अंदर सो रहे मालिक की आँख अचानक खुल गई।
नींद टूटने की वजह से मालिक बहुत गुस्से में आ गया। उसका चेहरा लाल हो गया और वह हाथों में एक मोटा डंडा लेकर बाहर भागता हुआ आया।
मालिक को डंडा हाथ में लिए आते देख चालाक बिल्ली तुरंत एक तरफ छिप गई। गुस्से में अंधे हुए मालिक ने बिना कुछ सोचे-समझे मोती कुत्ते और पहले से ही दर्द से तड़प रहे गधे पर डंडों की बरसात कर दी।
बिना किसी गलती के डंडे खाकर मोती कुत्ता दर्द से बिलबिला उठा और बेचारा सफेद गधा बेबसी में और भी तेज़ी से चिल्लाने लगा।
बिल्ली दूर झाड़ियों के पीछे से यह सब देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, जबकि वफ़ादार मोती और दर्द से कराहता गधा इंसान की इस बेदर्दी और स्वार्थ पर चुपचाप आँसू बहा रहे थे।
कहानी का संदेश:
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा और श्रेष्ठ इंसान वही है जो बेज़ुबानों, लाचारों और दूसरों की तकलीफ व दर्द को समझे तथा उनके प्रति दया भावना रखे। स्वार्थ और ईर्ष्या हमेशा दूसरों को दुख पहुँचाती है।
