पुनीत श्रीवास्तव

Others


4.0  

पुनीत श्रीवास्तव

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कोकोनट बिस्कुट !

कोकोनट बिस्कुट !

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पता नहीं अभी आता है या नहीं हम लोगो के स्कूल के समय मे बड़ा फेमस हुआ करता था ये बिस्कुट,नारियल के स्वाद का 

तीन या चार कतारों में एक एक मे दस पन्द्रह 

चार पांच रुपये का तब का ,बात भी तब की है अस्सी के दशक की ,

कोई आवे प्लेट में पेश पानी की स्टील की गिलास के साथ जग में पानी !

पहले आज की तरह के विकल्प नहीं होते थे 

न ही उतनी औपचारिकता 

पहले पानी वानी 

गर्मी हो तो सरबत रूह आफ़ज़ा या रसना वो भी सब के घर नहीं ही मिलता ,

फिर चिप्स तलते टीन के डिब्बों या डालडा रथ के बड़े डिब्बों से निकलते बरसाती में से ,चाय स्टील की कपों में ,हमारे घर में हम तीन भाई और चाचा के दो ,दोपहर में कोई शायदे सोए ,कुछ न कुछ खुरापात 

एक बड़ी तिलिस्मी कामयाबी मम्मी के छिपाए कोकोनट बिस्कुट को खोजना और पानी मे डुबो के खुरापाती पार्टी मनाना था !

कभी सफलता मिलती कभी नहीं ही मिलती 

धीरे से बीच दुपहर में चौके में घुसने के लिए पारखी शातिर दिमाग और बिना आवाज़ के कुंडी खोलना पहली सफलता ,

फिर धीरे से अंदर से बन्द कि कोई देखे न कि दरवाजा खुला है चौके का ,फिर तलाशी ,पुलिस सी नहीं सी बी आई सी !पुलिस तो बिखेर देती है अस्त व्यस्त कर देती है ,फिल्मों में देखा है  बस !!!

डिब्बे एक एक ,बड़े टीन वाले अलग ,ऊपर नीचे 

उसी कमरे में एक बक्सा था उस मे भी कई बार खोज बीन ,फिर सुस्ताते 

अक्सर हमहीं छठी इंद्री जगाते कि हो न हो इसमे है बिस्कुट !!!और अंततः ,तुक्का लग जाता !!!

सफलता आती देख मुँह बन्द कर हंसते आवाज़ न आये साथ चोर भाई मिल बैठ के खाते कुछ ऐसे ही कुछ पानी मे डूबो के !!!

कोई सबूत न छूटे बचा खुचा छोड़ देते ठीक जैसा मम्मी रखी हो !!उल्टे क्रम में दरवाजा खुलता ,बन्द कर फिर कुंडी चढ़ती !!!

मिशन कम्प्लीट !

ई टॉम क्रूज़वा तो बाद में फ़िल्म बनाने लगा हम लोगों की फ़िल्म बयासी से सतासी तक बनती रही 

असल मजा तब आता जब कोई पधारे 

सपरिवार और मम्मी चौके की तरफ बढ़ती 

चारे पांच छोड़े थे हम लोग 

ई सब मेहमान तो सात लोग हैं अब मम्मी क्या करेगी ?

भाग मिल्खा भाग भी बाद में बनी पर 

सच मे भागना मम्मी की रेंज से पहला काम होता !

आज दुपहर बेटी साथ लिटिल हर्ट खाये तो कोकोनट बिस्कुट याद आ गया 

उसका स्वाद सा आ गया बस वो समय याद करके।


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