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डाॅ.मधु कश्यप

Others

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डाॅ.मधु कश्यप

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कितना सहूँ?

कितना सहूँ?

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तुम कब तक यूँ अकेली रहोगी?" लोग उससे जब तब यह सवाल कर लेते हैं और वह मुस्कुरा कर कह देती है," आप सबके साथ मैं अकेली कैसे हो सकती हूं।"

उसकी शांत आँखों के पीछे हलचल होनी बन्द हो चुकी है। बहुत बोलने वाली वह लड़की अब सबके बीच चुप रह कर सबको सुनती है जैसे किसी अहम जवाब का इंतजार हो उसे।

जानकी ने दुनिया देखी थी उसकी अनुभवी आँखें समझ रहीं थीं कि कुछ तो हुआ है जिसने इस चंचल गुड़िया को संजीदा कर दिया है लेकिन क्या?

" संदली!, क्या मैं तुम्हारे पास बैठ सकती हूं?", प्यार भरे स्वर में उन्होंने पूछा।

" जरूर आंटी, यह भी कोई पूछने की बात है।" मुस्कुराती हुई संदली ने खिसक कर बैंच पर उनके बैठने के लिए जगह बना दी।

" कैसी हो ? क्या चल रहा है आजकल ? " जानकी ने बात शुरू करते हुए पूछा।

" बस आंटी वही रूटीन, कॉलिज- पढ़ाई...." संदली ने जवाब दिया।" आप सुनाइये।"

" बस बेटा, सब बढ़िया है। आजकल कुछ न कुछ नया सीखने की कोशिश कर रही हूं।" चश्मे को नाक पर सही करते हुए जानकी ने कहा।

" अरे वाह! क्या सीख रही है इन दिनों?" संदली ने कृत्रिम उत्साह दिखाते हुए कहा जिसे जानकी समझ कर भी अनदेखा कर गई।

 जानकी जी जान रही थी कि अगर इस लड़की के दिल को ना टटोला गया तो यह लड़की अंदर ही अंदर घुट जाएगी।

" आंटी आप क्या बता रही थी? क्या सीखा है आपने।" संदली मानो नींद से जागी हो ।

"वहीं बेटा , इंटरनेट। कैसे मैसेज करते हैं? कैसे पोस्ट करते हैं? मेरा दस साल का पोता ही मुझे यह सिखा रहा। देख लो! मुझे इस उम्र में भी कुछ नहीं आ रहा और मेरा पोता सब कुछ जान रहा।"

"अच्छा है ना आंटी! आपको बाहरी लोगों की जरूरत नहीं पड़ेगी। वर्ना यहाँ तो ....।" कहते कहते संदली चुप हो गई ।

"क्या कहा बेटा ?"

"कुछ नहीं आंटी। अच्छा है ना! अब आपको कोई परेशानी नहीं होगी।" संदली ने बात को घुमाते हुए कहा ।

"हाँ बेटा ! अजीब दुनिया है इंटरनेट की। दो ही दिन में मेरे ढेर सारे दोस्त बन गए। सब से बात कर बहुत अच्छा लगता है।" "हाँ आंटी ! पर कोई काम नहीं आता। न इंटरनेट के दोस्त और न ही इस दुनिया के लोग। सभी मतलबी होते हैं। अपना काम निकलते ही आपको भूल जाएँगे। सभी आपका फायदा उठाएँगे। चाहे वह मानसिक रूप से हो, आर्थिक रूप से हो या शारीरिक .....।" संदली रो पड़ी। मानो उसके दिल का गुबार फट पड़ा हो।

"क्या हुआ बेटा ? पूरी बात बताओ। मैं जान रही थी कि तुम बहुत कुछ अपने दिल में दबाए पड़ी हो। जिसे बाहर निकालने की बहुत जरूरत है। बताओ बेटा, मैं हूँ ना। मुझसे जो हो पाएगा, मैं करूँगी।"

" मेरे लिए कोई कुछ नहीं कर सकता आंटी। सभी कहते हैं कब तक अकेले रहोगी? मैं कहती हूँ आप सभी है ना! इससे आगे कोई नहीं पूछता कि मैंने ऐसा क्यों कहा ? सभी रटे रटाए जवाब चाहते हैं। पढ़ाई पूरी नहीं हुई कि माँ बाप ने शादी कर दी। पति ने सिर्फ पैसों के लिए शादी की थी। पैसे खत्म होते ही मुझे अपनी जिंदगी से दूध में मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका। मेरा पूरा शोषण हुआ पर मैं कुछ ना कर सकी। माँ ने कहा था निभाना, पर कितना यह नहीं बताया। अब मैं पूरी तरह टूट चुकी हूँ आंटी। इतना कुछ देख लिया इस छोटी सी उम्र में की उम्मीद ही छोड़ दी कि मुझे कोई प्यार करने वाला मिलेगा भी। लगता है, मिलेगा भी, तो वह भी उपयोग कर मुझे छोड़ देगा। क्या करूँ आप ही बताइए? मुझे भी एक दोस्त की, एक साथी की जरूरत है। पर विश्वास कैसे करूँ? बताइए आंटी ,बताइए ।" संदली जानकी जी के गोद में सर रखकर रो पड़ी। इतनी छोटी सी उम्र में ऐसा दुख देखकर जानकी जी अवाक रह गई। उन्हें समझ में ही नहीं आया कि वह क्या कहें? "बेटा! घबराओ मत अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है। अंगूर खट्टे निकल गए इसका मतलब यह नहीं कि अंगूर मीठे नहीं होते। हर पल लड़ने को ही जिंदगी कहते हैं और तुम तो बहुत हिम्मत वाली हो। तभी तो गलत रास्ता ना चुनकर, तुमने लड़ने का फैसला किया और अपनी एक नई जिंदगी शुरू कर जीत भी हासिल की। संदली बेटा! देखो इधर! मैं तुम्हारे साथ हूँ। हिम्मत मत हारो। पहले पढ़ाई पूरी करो। अपने पैरों पर खड़ा होकर जमाने को दिखाओ। फिर साथी भी ढूँढ लेंगे।" जानकी जी ने मुस्कुराते हुए कहा। अब संदली को मानो एक नई राह दिख रही थी जिस पर चलने के लिए वह तैयार थी और उसका कोई साथ देने वाला भी था।


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