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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Children Stories Inspirational

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Children Stories Inspirational

खोया सामान अब पछताये होत क्या?

खोया सामान अब पछताये होत क्या?

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रमेश अपने भाई-बहनों में सबसे छोटा था। उसके माता-पिता समझाते बेटा बीता समय कभी वापस लौटकर नहीं आता कभी समय न बर्बाद करो। पर वह इस कान से सुनता दूसरे से निकाल देता। दिन भर टीवी, फिल्में व सीरियल देखता रहता। स्कूल से भी गोला मार देता।

समय अपनी गति से चलता ही रहता है कोई का इंतजार नहीं करता। वह खाने पीने में भी बाजार की चीजें खाता जिससे अक्सर बीमार हो जाता।  

समय के बीतते सभी भाई-बहन पढ़-लिखकर जीवन में स्थापित होते गये। रमेश लाख जतन करने पर भी 10 वीं से अधिक नहीं पढ़ सका। सभी भाई-बहन अच्छी सरकारी प्राइवेट नौकरी में होने के कारण उनके विवाह सम्बन्ध अच्छे घरों के शिक्षित युवक-युवतियों से होते गये।

रमेश सबसे छोटा था अधिक पढ़ा-लिखा न होने के कारण कोई अपनी बेटी देने को तैयार नहीं था। पिता जी की आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक थी उन्होंने छोटी सी दैनिक जरूरत के सामान की दूकान रखवा दी। तभी उसके मामा जी ने अपने गांव की लड़की सिया का रिश्ता सुझाया।

सिया देखने में रमेश जैसी सुन्दर तो नहीं थी पर बहुत ही समझदार व कर्मठ थी। घर में मां बेटी ही थीं। जब वह 2 साल की थी उसके पिता शहर कमाने गये, एक दूसरी औरत से शादी कर वहीं बस गये। कुछ दिन मां बेटी के खर्च के लिए पैसे भेजते रहे फिर वह भी आने बंद हो गये । कभी उन दोनों की सुध ही नहीं 

ली।  

4 वर्ष की होते हुए भी सिया मां के दुख को बंटाने की भरसक कोशिश करती। उसकी मां अधिक पढ़ी-लिखी न होने के कारण कुछ घरों में साफ-सफाई का काम कर घर खर्च निकाल लेती साथ ही रात में अपनी शादी में मिली सिलाई मशीन में सिलाई का काम करती। सिया बटन,काज,हुक,तुरपाई जैसे छोटे-मोटे काम सीखती गयी। छोटे-छोटे हाथों से बर्तन साथ में धुला लेती।   

उसकी मां ने रमेश के मामा के घर से काम करना शुरू किया था क्योंकि वे दूर के रिश्तेदारी में थे। सिया मामा की बेटी के साथ सरकारी स्कूल में पढ़ने जाने लगी। वह खेलने के समय भी पढ़ती रहती। रमेश के मामा गांव के प्रधान भी थे। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक मदद व अपनी योग्यता के बल से बीएड कर रमेश के गांव के प्राइमरी स्कूल में उसकी नियुक्ति हो गई।  

मामा को यह रिश्ता सभी प्रकार से अच्छा लगा उन्होंने अपनी दीदी जीजा जी से बात कर बताया घर में दान- दहेज तो कुछ भी नहीं मिलेगा खानदान अच्छा है। आर्थिक स्थिति बिल्कुल ना के बराबर है शादी आपको ही दोनों तरफ से खर्च कर करनी पड़ेगी।

रमेश के माता-पिता समझदार थे वह समझते थे कि हमारे बेटे को इसी तरह की लड़की चाहिए। उन्होंने सिया की मां से बात कर और सिया के हां करने पर दोनों की शादी करने की सोची। रमेश ने बहुत हो हल्ला मचाया जिससे शादी न हो सकी । वह अपनी भाभियों जैसी सुन्दर व अच्छे घर की लड़की से ही विवाह करना चाहता था। उसने शादी से इनकार कर दिया।  

सिया थोड़ी आहत तो हुई पर वह अपने काम में लगी रही। रमेश के मामा को भी बड़ा दुख हुआ इधर रमेश के पिताजी की लाख कोशिशों के बाद भी कोई अच्छी लड़की ना मिल सकी।  

इसी बीच सिया के विद्यालय में एक नए अध्यापक की नियुक्ति हुई जो बहुत ही सुलझे और समझदार परिवार से थे। आर्थिक स्थिति रमेश के घर वालों जैसी तो नहीं थी पर फिर भी खाते पीते घर का था।  अपनी मां से उसने सिया की मां से बात करने को कहा। उन दोनों का विवाह हो गया।

रमेश की बढ़ती उम्र और रिश्ते ना मिलने के कारण रमेश भी परेशान था और उसके माता-पिता परेशान थे। आज रमेश को अपनी गलतियां समझ आ रही थी। अब रात दिन एक कर उसकी मां ने एक सुंदर बड़े घर की लड़की से शादी कर दी। वह लड़की पढ़ी-लिखी समझदार नहीं थी।

रमेश की खाने की आदतों के कारण तबीयत बिगड़ती तो रमेश को छोड़कर घूमने चली जाती अब रमेश ने अपना स्वास्थ्य,धन, रिश्ते सभी खो दिए थे। रमेश को ना रिश्तों की कदर थी ना स्वास्थ्य की। माता-पिता भी उम्र बढ्ने के कारण अशक्त थे। आज सब उसकी कदर नहीं कर रहे थे। दूकान की हालात बिगड़ते देख बड़े घर की लड़की काम तो कभी किये ही नहीं थे लड़-झगड़ कर अपने मायके जाकर रहने लगी।

सिया अब उसी गांव में प्रधानाध्यापिका हो गयी थी। उसे दो छोटे-छोटे गोल-मटोल बच्चों, पति के साथ निकलते देख रमेश को एक ऐसी चुभन होती मानो उसी का खोया सामान हो। उसे समझ आ रहा था कि जीवन में खोए हुए समय, माता-पिता व रिश्तों की क्या अहमियत होती है बखूबी समझ आ गया था।

"अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत "।


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