घर
घर
उसे लगता था, अपने घर वालों के बिना वह नहीं जी पाएगी पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह जिंदा भी रही और उनके बिना भी रही। बार - बार मन धिक्कारता, पर फिर भी वापस जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। कैसे जाती, जब अपने मुंह से कह चुकी थी ,'मुझे मेरा घर बसाना है पहले, मायका फिर देख लूंगी। मायके में तो लड़कियाँ पैदा ही होती है उसे छोड़ने के लिए।' नहीं गई तो नहीं ही गई, ना जा पाई और न ही रह पाई। पर वह तो औरत है यानी जो दूसरों में रत रहे। जिसका अपना कुछ है ही नहीं और न अपने लिए ही है। वह तो बस जो करेगी, दूसरों के लिए करेगी। पूजा - पाठ, व्रत, सजना - संवरना, खाना बनाना, घर सजाना, बच्चे पैदा करना भी सब दूसरों के लिए है।
लड़की कहीं जाएगी तो बसाने के लिए, बनाने के लिए। भगवान ने जब स्त्री बनाई तो इसमें एक विशेष तत्व भी डाल दिया या कान में मंत्र फूंक दिया ,"वसुधैव कुटुंबकम्", सारी धरती ही तुम्हारा घर है, सब लोग तुम्हारे अपने है। जहां जाओगी, उसको ही अपना लोगी, और भी न जाने क्या - क्या ? ईश्वर ने क्यों किया ऐसा? जो रिश्ते उसे जन्म से मिले, जिन्होंने जन्म दिया बस उनकी ही न हो पाई, उनके लिए ही न कुछ कर पाई, बाकी सबके लिए सब कुछ। जिन ससुराल वालों के लिए सब कुछ किया, उन्होंने भी उसे मान - सम्मान नहीं दिया। बस वसुधा को भी ज़िद हो गई, कुछ और तो नहीं बचा पाई पर अपने आत्म - सम्मान के लिए लडूंगी। इन्हीं सब में उसने ससुराल भी छोड़ दिया पर मायके भी नहीं गई। किस मुंह से जाती, जिन्हें सबके सामने लज्जित कर दिया , अब उनकी लज्जा का कारण वह नहीं बनना चाहती थी। बस, उसने वसुधैव कुटुंबकम् को अपनाते हुए उसने एक अपना घर बनाया जिसमें हर वह शख्स आकर रह सकता था जिसके पास अपने नहीं थे, अपना घर नहीं था। अब सबके पास 'घर ' था।
