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S N Sharma

Others

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S N Sharma

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एक थी संगीता

एक थी संगीता

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सुबह का धुंधलका छटने लगा था चिड़ियों की चह,- चहाहट बढ़ गई थी । पता नहीं इन चिड़ियों को इतने अंधेरे में भी कैसे पता चल जाता है कि अब सूर्य उगने को है। और वे चह चहाने लगती हैं। अब प्राची में आकाश में हल्की सी लालिमा जाने लगी थी।थोड़ी देर में एक नई भोर होने वाली थी।

आज मोहन सिंह जी की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी । इक्यासी साल की उम्र में तबीयत खराब होना एक सामान्य बात होती है। पर मोहन सिंह एक संयमित जीवन शैली के कसरत प्रिय आदमी थे ।और उन्होंने अपना स्वास्थ्य तथा शरीर प्रतिदिन की नियमित कसरत से ठीक से बना रखा था ।और अपनी उम्र को लगभग 15 साल पीछे धकेल दिया था।

मोहन सिंह जी की पत्नी शामली देवी का देहांत लगभग 15 साल पहले हो गया था ।मोहन सिंह जी की पत्नी एक सुंदर और घरेलू महिला थी। उनका अपने पति के प्रति अनन्य प्रेम था ।पर दुर्भाग्य यही था कि उन्हें कोई संतति नहीं थी। और इसी को लेकर बहुत दुखी भी रहती थी ।

             मोहन जी और उनकी पत्नी जब शाम के समय जब चाय पी रहे थे, तभी अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा और शामली देवी का स्वर्गवास हो गया।

मोहन सिंह जी एक सरकारी दफ्तर में प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत थे।

मोहन सिंह जी को रिटायर हुए तब एक ही वर्ष हुआ था। उन्हें पच्चीस हजार रूपए प्रति माह पेंशन के मिलते थे। वह तब 61 वर्ष के थे ।उन्हें घर का अकेलापन बहुत कचोटता था।

           वह दिन भर घर के छोटे मोटे कामों में लगे रहते थे ।सुबह शाम का समय टहलने जाना और व्यायाम का हुआ करता था। और अपना बाकी समय सामाजिक कार्यों में लगा देते थे।

उनके मन में शामली देवी की छवि इतने गहरे तक अंकित थी ।उसी प्यारी छबि के भरोसे, उनकी यादों के सहारे और घर में छोड़ी गई उनकी निशानियां को देखकर ही उन्होंने अपनी उम्र के 15 साल यूं ही बिता दिए।

आज खराब स्वास्थ्य के कारण जब उनका विस्तर से उठने का मन नहीं कर रहा था। उन्हें काफी असहज सा लग रहा था। आज अगर शामली देवी होती निश्चित तौर पर ही उनकी ढंग से देखभाल हो रही होती। यह सोच कर उनके मुंह से एक ठंडी सांस निकल गई।

समाज सेवा के दौरान मोहन सिंह जी का परिचय एक ऐसी बेसहारा महिला संगीता से हुआ, जिसका पति किसी प्राइवेट कंपनी के ऑफिस में चपरासी था। शराब की लत होने से वह शराब पीकर अपनी पत्नी से मारपीट किया करता था ।अत्याधिक शराब के सेवन से विवाह के 6 साल के अंदर ही लीवर खराब होने के कारण स्वर्गवास हो गया था।

संगीता को एक 6 साल का बेटा भी था। पति के देहांत के बाद संगीता को उसकी सास ने बच्चे के साथ घर से निकाल दिया था। सड़क पर ठोकरें खाते संगीता और उसके बच्चे को जब मोहन सिंह जी ने देखा था, तो उनके पुनर्वास में उन्होंने मदद की थी। तथा उसे एक सिलाई की मशीन दिला दी थी। और उसके रहने की व्यवस्था एक परीचित ऑफिसर के सर्वेंट क्वार्टर में में करवा दी थी ।

संगीता अपने मकान मालिक के घर के झाड़ू और पोंछा कर दिया कर दी थी तथा उनके छोटे-मोटे कामों में भी मदद कर दिया करती थी।

मोहन सिंह जी दयालु स्वभाव के व्यक्ति के व्यक्ति थे वह बीच-बीच में संगीता से मिलते रहते थे। और थोड़ी बहुत यथासंभव आर्थिक मदद भी कर दिया करते थे।

एक दिन संगीता का फोन आया ।उसने रोते हुए मोहन सिंह को बताया कि उसके बेटे जय को कोई कार टक्कर मार कर चली गई । बेटे के स्कूल बैग में रखी कापी से किसी सज्जन ने उसका स्कूल का फोन नंबर लेकर प्रिंसिपल को बताया ।और बेसुध जय को सरकारी अस्पताल में भर्ती कर दिया। स्कूल से फोन आने पर ही उसे पता चला कि बेटा अस्पताल में भर्ती है।

जय को काफी चोटें आई थी डॉक्टर ने उसे दस दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती कर लिया ।

बच्चे की देखरेख के लिए संगीता ने मोहन सिंह जी से मदद की याचना की।

मोहन सिंह अपने हाथ का काम छोड़ कर तुरंत अस्पताल पहुंचे उन्होंने कुछ रुपए संगीता को दिए और जय के इलाज के लिए आवश्यक दवाइयां भी ले आए।

जय को होश आने में 2 दिन लग गए। तब तक लगातार मोहन सिंह जी दिन रात संगीता के साथ अस्पताल में ही बने रहे। उन दिनों जय को देखने संगीता के घर से कोई भी नहीं आया।

शेष पूरे आठ दिन तक मोहन सिंह लगातार अस्पताल जाते रहे, और बेसहारा संगीता के लिए पैसे और रोटी का भी इंतजाम करते रहे।

दसवे दिन जब जय को रिलीव करा कर अपनी कार से वह हॉस्पिटल से संगीता के घर तक लाए तो संगीता रोती हुई कृतज्ञता से उनके उनके पैरों में गिर पड़ी। उसे कंधे से पकड़कर उठाते हुए मोहन सिंह जी ने कहा " संगीता यह दुनिया बड़ी बेरहम है। तुम्हें जब भी मेरी सहायता की आवश्यकता हो तो मुझे अपना समझ कर कर बेहिचक फोन कर लिया करना"।

संगीता ने मोहन सिंह जी की आंखों में झांका । उसे मोहन सिंह जी की आंखों में अपने लिए एक लगाव सा नजर आया।

आज जब मोहन सिंह की तबीयत खराब थी और वह दर्द से कराह रहे थे तो उसी समय अचानक, संगीता का फोन आया ।वह अपने बेटे की राजी खुशी का समाचार  उन्हें दे रही थी ।तभी मोहन सिंह जी की कराहने की आवाज सुनकर उसने कहा "आपको क्या हो गया सर"

मोहन सिंह ने कहा " कुछ नहीं। थोड़ा सा बुखार है ।उठते नहीं बनता।"

यह सुनकर संगीता अपने बेटे के साथ मोहन सिंह जी के घर जा पहुंची। उसने मोहन सिंह जी के माथे पर पानी की पट्टी रखी । उनके हाथ पैर दुख रहे थे संगीता ने और उनके बेटे ने जय ने मोहन सिंह के हाथ पैर दबाए।

 दो दिन तक वे दोनों मां बेटे मोहन सिंह जी के घर पर रुके रहे ।और उनकी सेवा सुश्रुषा करते रहे।

आज पत्नी देहांत के 15 वर्षों बाद उन्हें किसी स्त्री का स्नेह मिला था ।जो अपने बच्चे के साथ उनकी सेवा के लिए तत्पर थी।

मोहन सिंह जी मोहन सिंह जी बिस्तर पर लेटे हुए लगातार विचारों में खोए रहे ।उन्होंने सोचा "कौन है मेरे पास बाद जो मेरे घर और मेरी प्रॉपर्टी का उपभोग करेगा? मेरे भाई के बच्चे जो मेरी तबीयत खराब होने की जानकारी होने पर भी मेरे देखने के लिए तक नहीं आ सके ।उनके लिए सारी प्रॉपर्टी छोड़ना उचित नहीं है। संगीता और उसका बेटा कितने निस्वार्थ भाव से मेरी सेवा कर दें रहे हैं ।क्यों ना यह सब उनके लिए ही दे दिया जाए" यह सोच कर उन्होंने संगीता को आवाज लगाई। संगीता किचन में थी। हाथ धोकर अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए बह मोहन सिंह के पास आई।

और पूछा "क्या बात है सर आपको क्या चाय चाहिए।"

 मोहन सिंह जी ने संगीता को बैठने के लिए कहा।

कुर्सी पर बैठे हुए संगीता ने कहा संगीता ने कहा "क्या बात है सर।"

"संगीता आज में जो कुछ कहने जा रहा हूं तुम उसे ध्यान से सुनो"   गंभीर स्वर में मोहन सिंह बोले।

"क्या बात है सर "चिंतित स्वर में संगीता ने कहा ।

संगीता ने पूछा " क्या मुझसे कोई गलती हो गई है।"

"संगीता मेरी पत्नी के देहांत हो आज 15 वर्षों से हो चुके हैं इतने वर्षों में मैंने कभी भी उसकी यादों को अपने से जुदा नहीं किया। आज जब में बिस्तर पर बीमार हो कर लेटा हूं तो मुझे अब लगता है कि इस उम्र में मुझे सच में सहारे की आवश्यकता है।"

"क्या तुम मेरे साथ दे सकती हो।"

37 वर्षीया संगीता ने कहा 'सर आपके सारे कामकाज के लिए मैं और मेरा बेटा हर दिन हाजिर हैं। आज सेआपको किसी भी तरीके की दिक्कत नहीं होने देंगे आप चिंता ना करें।'

"नहीं संगीता मैं तुम्हें नौकरी के लिए आने का नहीं कह रहा हूं मैं यह जानना चाहता हूं कीक्या तुम मुझ 81 वर्षीय बूढ़े से पुनर्विवाह कर सकती हो।"???

संगीता आवक सी रह गई ।उसने कुछ बोलने का प्रयास किया।

" नहीं नहीं बोलो नहीं। मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है। मैं इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि मुझे तुम्हारे सहारे की आवश्यकता है ।उससे ज्यादा कहीं तुम्हें भी एक ऐसा सहारा चाहिए ,जो तुम्हारी उम्र भर तुम्हारा साथ दे सके। हालाकि मैं तो उम्र भर तुम्हारा साथ नहीं दे पाऊंगा। पर मेरे मरने के बाद मेरी जमीन जायदाद सब आपका सहारा बनी रहेगी।"यह कहकर मोहन सिंह जी मौन हो गए।

          संगीता ने कुछ देर तक कुछ भी न कहा। वह कुर्सी पर बैठी हुई नीचे देख कर कुर्सी का कोना कुरेदती रही

फिर गहरी सांस लेकर उसने कहा "सर यह दुनिया वाले क्या सोचेंगे की मैंने ,एक 37 वर्षीय एक बच्चे की मां ने, एक 81 वर्ष के बुड्ढे को फंसा लिया और उसकी जमीन जायदाद हड़पने के लिए उससे विवाह भी कर लिया। सर वैसे ही आपके घर बनी रहूंगी। और इस तन और मन से आपकी सेवा करती रहूंगी मेरी यह देह भीआप को समर्पित है और आपकी सेवा करेगी तो इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। पर आप मुझसे विवाह की मत कहिएगा इसमें आपका मेरा दोनों का भला है।"

मोहन सिंह जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा

"पिछले 15 सालों से, जबकि मैं विवाह कर सकता था, और मेरे लिए कोई एक रिश्ता भी उपलब्ध हो जाता। पर मैंने कभी विवाह के बारे में नहीं सोचा ।आज जब बदली हुई परिस्थिति मेरे सामने है ।मुझे जीवन में सिर्फ सेक्स नहीं चाहिए मैं सामाजिक तौर पर तुम्हारा दायित्व स्वीकार करना चाहता हूं ।जमाने की छोड़ो कि जमाना क्या कहेगा इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। बस मैं तुम्हारा और तुम्हारे बच्चे का जीवन संभालना चाहता हूं ।और इसके बदले में यदि तुम अपना अपनत्व मुझे दोगी तो इसे मैं अपना सौभाग्य समझूंगा।"

काफी सोच-विचार के बाद संगीता ने सिर हिला कर अपनी सहमति दे दी ।और अगले दिन मोहन सिंह जी ने एसडीएम कोर्ट में अपने विवाह के पेपर सबमिट कर दिए।

आज मैरिज कोर्ट में 81 वर्षीय मोहन सिंह जी की 37 वर्षीय संगीता से शादी संपन्न हुई।


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