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Richa Baijal

Others


3.5  

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डे 28 : हमारे संरक्षक

डे 28 : हमारे संरक्षक

3 mins 220 3 mins 220

डिअर डायरी,

डे 28 : लॉक डाउन 2.0 का सातवाँ दिन :हमारे संरक्षक :21.04.2020


19000 कोरोना केसेस, 600 मौतें और 5000 के करीब पेशेंट्स पूर्ण रूप से स्वस्थ हो चुके हैं। आज तक तो हमने विधान सभा और लोकसभा के लाइव सेशन देखें है टीवी पर, कोरोना से लड़ाई में देश के सभी चीफ मिनिस्टर सामने आये। गोवा के चीफ मिनिस्टर ने २ दिन पहले कहा कि गोवा "कोरोना -फ्री " हो गया है। कहीं डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट की लापरवाही की वजह से उसका ट्रांसफर हुआ तो कहीं मुख्य मंत्री स्वयं ये कहते हुए नज़र आये कि मेरे राज्य में कोरोना के केसेस बढ़ रहे हैं, तो मैं लॉक डाउन में कोई रियायत नहीं दूँगा। आज से पहले मीडिया ने पोलिटिकल पार्टीज के झगड़े ही दिखाए हैं। इस बुरे वक्त में सरकार की कार्य प्रणाली देखने को मिली। ज़ूम एप्प को जब सरकार ने अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों से बात करने के लिए इस्तेमाल किया तो पाया कि इस एप्प में काफी कमियाँ है और ये डाटा चोरी करती है। नाम गया सीधा चीन पर, लेकिन एप्प यू . एस. ऐ. ने बनायी है। मल्टीप्ल वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग की इस एप्प का विकल्प लाने के लिए भारत के सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट्स से कहा गया। सोशल डिस्टन्सिंग के चलते उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर अपने पिताजी की अंतिम यात्रा में नहीं गए तो वहीँ जब कोटा के छात्रों को बसें मंगवा कर घर पहुँचाया गया तब इसकी आलोचना हुई कि मज़दूरों के पलायन के वक्त ये सुविधा क्यों नहीं दी गयी ? प्रशासन कुछ भी कह रहा हो या जनता कुछ भी समझ रही हो, मेरी अपनी सोच ये है कि उन बच्चों ने काफी दिन कोटा में ही रूककर साधन मिल जाने का इंतज़ार किया, मज़दूरों की तरह निकल नहीं पड़े थे नंगे पैर। एक तरफ विश्वास था, तो दूसरी तरफ अविश्वास, और यही फर्क था दोनों वर्गों की प्रस्थान -प्रक्रिया में। कुछ मज़दूरों की मौत भी हुई, क्यूंकि पैदल चल कर सीमा तय करेंगे, ये बस एक ज़िद्द है, यदि वो वहीँ रुक जाते तो मुमकिन था कि प्रशासन दो वक्त की रोटी उपलब्ध कराता। मौलवी और मौलानाओं ने अपनी गलती को माना और टीवी पर रोकर 'कोरोना ' की व्यापकता और क़हर को स्वीकारा। कुछ साजिशें बाहर आईं, लेकिन फिर भी पुलिस ने अपनेपन और प्यार से लोगों के बीच जाकर अपना कर्त्तव्य निभाया। डॉक्टर्स भगवान बनकर सामने आये, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि लड़ाई किससे है, फिर भी अपनी सेवाएं निरंतर देते रहे।


बहुत कुछ देखा और समझा। हर तरह की परिस्थिति नयी थी और फैसला तुरंत लेना था। सभी डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रैटेस अपने चीफ मिनिस्टर को रिपोर्ट करते थे और चीफ मिनिस्टर्स प्राइम मिनिस्टर को रिपोर्ट देते थे। व्यापक तौर पर कहूं तो ऐसा महसूस हुआ कि हम सब इनके बच्चे हैं और ये आला -अफसर हमारे संरक्षक । एक पिता सरीखा हाथ महसूस हुआ सर पर। और इनका यही देशवासियों के लिए की गयी सेवा है कि हम ऑंखें मूँद कर घरों में सो पाते हैं। ये व्यवस्था बहुत ज़रूरी है और हमारे सरंक्षकों का सक्षम होना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। हर किसी का कार्य काबिल- ऐ - तारीफ है और इन व्यवस्थापकों का आप जितना भी शुक्रिया अदा करो, वो कम ही है।  



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