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Ravi Ranjan Goswami

Children Stories Fantasy Thriller


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Ravi Ranjan Goswami

Children Stories Fantasy Thriller


भुतनी का थप्पड़।

भुतनी का थप्पड़।

5 mins 220 5 mins 220

एक फिल्म आयी है थप्पड़। अजीब सा नाम है। हेरोइन पन्नू की गिनती आजकल अच्छी एक्ट्रेस में होती है। सो देखने की इच्छा होती है फिर टाल जाता हूँ। अपने आप सोच लेता हूँ पिक्चर में किसी ने किसी को थप्पड़ मारा होगा और खाने वाले ने बदला लिया होगा। किसी फिल्म में एक थप्पड़ की जबरदस्त गूँज सुनी थी।

एक थप्पड़ मुझे भी कभी ऐसा पड़ा था जिसकी आवाज अब भी कभी कभी सुनायी देती है। जब सुनायी देती है मैं सहम जाता हूँ।

मेरी उम्र तब करीब 8या 9 साल रही होगी। मुझे घर में सब चिंटू कह कर बुलाते थे मुझसे बड़े दो भाई मोंटू, टुक्कू थे और एक बड़ी बहन टीना थी। बहन सबसे बड़ी थीं और समझदार भी। मेरा कभी मुझसे दो साल बड़े भाई मोंटू से झगड़ा होता तो वही बीच बचाव करती थी।

यह उन दिनों की बात है जब घर परिवार में लगातार कोई न कोई परेशानी चल रही थी। कोई न कोई बीमार रहता। पापा को घाटा हो गया था। सर पर कर्जा चढ़ गया था। परेशानी जब हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो व्यक्ति कहीं से भी कुछ राहत पाना चाहता है । वो फिर किसी संत महात्मा से मिले या ज्योतिषी और तांत्रिक से। पापा ने पहले अपना हाथ दिखाना शुरू किया। कोई मेहमान भी घर में आये और जरा सा भी उसे हस्त रेखाओं के बारे में पता हों। पापा अपनी हथेलियाँ उसके सामने फैला कर बैठ जाते। अधिकतर वे कुछ अच्छा ही बोलते। पापा थोड़ी देर के लिए खुश हो जाते और चिंता थोड़ी कम हो जाती। 

एक दिन पापा के एक शुभ चिंतक किसी बाबाजी को घर ले आये। बाबाजी ने पूरे घर का चक्कर लगाया और अपना निर्णय सुनाया। 

वे बोले, “ घर ठीक नहीं है। समस्या है। समाधान कराना होगा।”

ऐसा जब कोई कार्य होता तो मैं उत्सुकता से आसपास ही रहता था। बातें सुनकर अपनी समझ के अनुसार निष्कर्ष निकालता था। लेकिन बाबाजी ने तो स्पष्ट कहा, “घर में भुतनियाँ हैं। वही शरारत कर रहीं हैं। इनको भगाना होगा।”

पापा ने पूछा, “क्या करना पड़ेगा।“

जो व्यक्ति उन्हें ले के आया था, उसने पापा से कहा, आप तो बाबाजी को खर्चा दे दो यह सब सामग्री लाकर पूजा कर देंगे और समस्या का समाधान हो जाएगा।“

बाबाजी ने कहा, “अभी पांच सौ रुपये दे दो। मैं दो दिन वाद अमावस्या की शाम को आकर पूजा कर दूंगा । कुछ कम बढ़ होगा तो तब देख लेंगे।”

पापा ने सोचा यह भी आजमा लेते हैं। शेष डाक्टर और वकील के माध्यम से भी उपाय किए जा रहे थे। 

अब मेरे लिए समस्या हो गयी। ये किसी ने पूछा ही नहीं था कि वे भुतनियां किस कमरे में डेरा डाले है। दोनों एक साथ रहती है या अलग अलग। उनकी दिन या रात चर्या क्या है। वे कैसी दिखती है। मैंने कहानी किस्सों के आधार पर उनकी अनेक छवियाँ गढ़ ली। कुछ भयानक और कुछ सादा।

वे भरी गर्मियों के दिन थे दोपहर सुनसान होती थी। पापा काम पर गए होते थे। बाकी लोग खाना खाकर कूलर के सामने एक कमरे में विश्राम करते थे। मुझसे एक जगह बैठा नहीं जाता था।

एक दिन ऐसे ही बोर होकर मैं दूसरे कमरे में पंखे के नीचे बैठ कर चंदा मामा पढ़ रहा था।

अचानक तेज हवा चली और कमरे के दरवाजे के किवाड़ और खिड़कियों के पल्ले फटाक फटाक की आवाज के साथ खुलने और बंद होने लगे। मैंने उठ कर दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर दीं। और चंदा मामा पढ़ने लगा । संयोग से मैंने वेताल की कहानी पढ़ना शुरू की। वो मेरी प्रिय कहानी होती थीं। उसके भूत से मुझे रोमांच तो होता था किन्तु भय नहीं।

मैं कहानी पढ़ने में मशगूल था। अचानक फिर तेज हवा चली। धड़ाक से खिड़की खुली और एक काली बिल्ली भाग कर खिड़की से बाहर निकल गयी। इस घटना में दो रहस्यमय बाते हुई। बिल्ली को मैंने कमरे में देखा नहीं था और खिड़की मैंने बंद कर दी थी। सो सवाल था बिल्ली कब और कैसे कमरे में आयी और खिड़की अपने आप कैसे खुली। मुझे भूतनियों का स्मरण हो आया मैं पुस्तक पटक कर दरवाजा खोल कर माँ के पास भागा। माँ जाग गयी थी। मुझे हड़बड़ाया देखकर उन्होंने पूछा, ”क्या हुआ?”

मैंने खिड़की खुलने और काली बिल्ली के भागने की बात बतायी। माँ ने कहा, “बिल्ली पहले से अंदर होगी और खिड़की अच्छी तरह बंद न होगी।”

मैंने माँ की बात को काटा नहीं किन्तु मैंने रूप बदलने वाली भूतनियों की कहानियाँ पढ़ी हुई थी। अतः मेरी शंका बनी रही। 

अब घर में बाबाजी का सबसे अधिक इंतजार मुझे था। एक दिन बाद उनको आना था ।

उन दिनों हम लोग गर्मियों में छत पर सोते थे। छत को पहले पानी छिड़क कर या पानी से धोकर ठंडा करते थे फिर चारपाइयाँ बिछा कर सोते थे।

रोज की तरह हम लोग छत पर सोये थे । देर रात बूँदा बाँदी शुरू हो गयी। मैं नींद मैं था और आलस बस उठने के मूड में नहीं था। मैं चादर ओढ़कर मुंह ढाप कर सोता रहा।

मुझे ज्ञात नहीं मेरा भ्रम था या सच किसी ने मुंह से मेरा चादर खींचकर मेरे दाहिने गाल पर एक झन्नाटे दार थप्पड़ मारा। मैं चौंक कर अपना गाल सहलाता हुआ उठ बैठा। आसपास देखा तो कोई नहीं था। छत पर मैं अकेला था। बूँदा बाँदी तेज हो गयी थी। बाकी लोग अपना बिस्तर लेकर कमरे में सोने जा चुके थे। मैं अपना बिस्तर छोड़ के भागा। मुझे लगा कोई मेरे पीछे आ रहा है। किन्तु पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हुई। मैं कमरे में जाकर माँ के साथ दुबक कर सो गया।

सुबह जागने के बाद भी थप्पड़ की आवाज कान में सुनाई दे रही थी और गाल भी लग रहा था जैसे थोड़ा सूजा हुआ था।

अमावस्या को बाबाजी ने आकर पूजा की मैं बराबर उनके आस पास रहा। मेरे भाई बहन को इस कार्य में अधिक दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें भूतनी का थप्पड़ नहीं पड़ा था। मुझे पड़ा था अतः मैं सुनिश्चित करना चाहता था की बाबाजी की पूजा अच्छे से सम्पन्न हुई ताकि भूतनियां भाग जाएँ।

एक संभावना ये भी थी मोंटू थप्पड़ मार के भाग गया हो। दिन में हम लोगों का लूडो खेलते समय झगड़ा भी हुआ था। लेकिन भूतनी की संभावना भी बराबर थी। क्योंकि उनको भगाने के कार्य में मेरी अधिक दिलचस्पी थी ।



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