"बदलाव"
"बदलाव"
"क्या बताऊँ शलभ...जितनी बार किसी नये विषय पर लिखा है, पाठकों ने पसंद नहीं किया।" प्रतिमा परेशान थी।
"सच में, सास-बहू, पति-पत्नी या बूढ़े दुखियारे अभिभावक... इनकी कहानियां ही पसंद की जाती हैं। शोषित अबला पर भी थोड़े संवेदनशील पाठक मिल जाते हैं लेकिन बाकी मुद्दों पर कोई टिप्पणी भी नहीं देता।" शलभ ने समर्थन किया।
"लेकिन कुछ ही विषय पर कितना लिखें और कितना पढ़े, टी.वी. भरा पड़ा हैं इन्हीं कहानियों से... कुछ तो नया, समसामयिक चाहिए ना.."
"नहीं प्रतिमा... कुछ नया नहीं पसंद आयेंगा। दूसरे मुद्दों पर सोचने में कष्ट होता हैं.. विचार उद्वेलित तो होते हैं, लेकिन अकर्मण्यता कुछ करने नहीं देतीं। वैचारिक उथलपुथल से जीवन शैली स्थिर नहीं रहती और बदलाव लाने का जोश हैं नहीं। तो यही बेहतर हैं सदियों से चली आ रही नोंकझोंक मे ही आनन्दित रहा जाए।" शलभ ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा।
"सही कह रहे हो... यह तो कुछ इसी तरह हैं, जैसे घर पहुंच कर एक पेग लगाया, खाना खाया और चैन से सो गए.... कल भले ही यह सब नुकसानदेह हो पर आज तो सही गुजर गया..."
"क्या करा जा सकता हैं? कोई भी लत जल्दी नहीं छूटती। अब यह तो तुम्हे सोचना है..अपने संतोष के लिए लिखना हैं या पाठकों की पसंद का लिखना हैं...."
"इसमें सोचना क्या हैं.." मुस्कुराते हुए प्रतिमा बोली "मैं तो अपने विचार रखती रहूँगी... शायद इस की भी लत लग जाएं!!!"
