Mukta Sahay

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4.7  

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अध्याय-3, माँ! मेरे मामा क्यों नहीं

अध्याय-3, माँ! मेरे मामा क्यों नहीं

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अनुराग जब घर आए तो हम सभी ने साथ में खाना खाया और अमित को सोने भेज दिया। जैसा कि अनुराग की आदत है सोने से पहले किताब पढ़ने की, वह अपनी किताब के साथ बैठे थे। मैं पास बैठ गई। मुझे इस तरह बैठा पा वह भाँप गए की मैं किसी कश्मकश में हूँ। किताब बंद कर वह मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहते है, क्या हुआ नीला सब ठीक तो है? कुछ पशोपेश में लग रही हो। तुम्हारी अपने घर वालों की कोई बात हुई है क्या, कहीं कोई दिख तो नहीं गया अपने उसे खड़ूस से व्यवहार के साथ। अमूमन मैं ऐसी उदास अपने मायके के याद आने पर ही होती हूँ।

मैंने बताया अमित कि जिज्ञासा और सवाल के बारे में। मामा से भी जो बात हुई वह भी बताया। थोडा सोंच कर अनुराग ने कहा मुझे लगता है हमें एक बार फिर तुम्हारे घर वालों से मिलना चाहिए। इस बार सभी से एक साथ नहीं अलग अलग मिलते हैं। इस इतवार बड़े भैया से मिलते है क्योंकि सबसे ज़्यादा नाराज़गी उन्हें ही है और उनका कहा घर में सभी मानते भी हैं। वह हर इतवार की सुबह क्लब जाते हैं, तैरने के लिए। हम दोनो भी चलते हैं क्लब और उनसे बात करने की कोशिश करते हैं।

इतवार को हम दोनो क्लब पहुँचे। उस समय तक भैया नहीं आए थे। हम दोनो ने चेंज किया और पूल में उतर गए। पिछले तनाव भरे दिनों के बाद खूबसूरत सुबह और पूल का शीतल निर्मल जल, मुझे बहुत आराम महसूस हुआ, मैं आनंदित हो गई । बहुत महीनों के बाद मैं पूल में उतरी थी सो अभी इसे ही पूरी तन्मियता से अनुभव कर रही थी की अचानक अनुराग के पैर मुझे लगे। मैंने उन्हें देखा तो उन्हने मुझे पूल के कोने में लगे शॉवर की तरफ़ देखने का इशारा किया। भैया शॉवर ले रहे थे। मेरी धड़कन थोड़ी बढ़ सी गई। भैया पूल में उतर आए मगर अभी हमें देखा नहीं था। अनुराग ने मुझे वहीं रुकने को कहा और भैया की तरफ़ बढ़ गए। जैसे जैसे अनुराग भैया के क़रीब बढ़ रहे थे मेरी साँस रुक सी रही थी कि आगे क्या होगा। अनुराग भैया के पास जा कर उन्हें नमस्ते करे तो भैया भी उन्हें नमस्ते कर दिए। फिर पलट कर देखा शायद पहचान नहीं पाए थे। तुम! थोडा कड़वा सा चेहरा बनते हुए भैया ने कहा। अनुराग ने कहा, भैया आपसे बात करनी थी। भैया बोले, रिश्ते ना बनाओ और मैं तुमसे कोई बात नहीं करना चाहता। अनुराग मेरी तरफ़ इशारा करते हुए कहते है, नीला भी आई है कुछ बहुत ही अहम और गम्भीर बात है। यह सुन कर भैया का रुख़ थोडा नरम हुआ। वह बोले चलो बाहर निकलते है, बैठ कर बात करते हैं। अनुराग ने मुझे भी बाहर आने को कहा। इतनी जल्दी भैया बात करने के लिए मन जाएँगे ऐसी आशा नहीं थी हमें। चेंज कर के हम तीनो पूल के किनारे लगे टेबल पर ही बैठ गए।

भैया ने कहा, हाँ अब बताओ क्या बात करनी है, ऐसा संजीदा क्या हो गया जो तुम दोनो यहाँ आए। लहजे में थोडा तंज था पर जिज्ञासा भी थी। मुझ में कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अनुराग ने कहा, भैया अब हमारी शादी और आपकी नाराज़गी के दस साल से भी ज़्यादा हो गए हैं। हमारे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं और उनके पास बहुत से सवाल भी हैं हमारे रिश्ते को ले कर। मुझे यक़ीन है आपकी सात साल की गुड़िया भी कई ऐसे प्रश्न लेकर सामने खड़ी होती होगी, अपनी बुआ को ले कर जिनका उत्तर देना कठिन होता होगा। हमारा अमित भी हमें असमंजस में डाल देता है ऐसे ही सवालों से। भैया गम्भीर मुद्रा में सारी बात सुन रहे थे। अनुराग आगे बोले, ऐसा ही एक प्रश्न ले कर अमित हमारे सामने खड़ा है कि उसके मामा क़्यों नहीं हैं? यह प्रश्न वह कई बार कर चुका है। हम दोनो इस द्वंद में हैं कि उसे सब सच बता दे तो कहीं वह इन रिश्तों के प्रति कोई ग़लत भावना ना बना ले। दूसरा उपाय यह है की हम सभी आपस की कड़वाहट मिटा कर इन बच्चों की ख़ातिर साथ में आगे बढ़े।

अनुराग अपनी बात पूरी कर चुप हो गए थे। भैया बोले, कुछ और भी बात हो तो बता दो। हम दोनो ने साथ में कहा नहीं अभी तो यही समस्या है। भैया थोड़े व्यंगात्मकता से कहते हैं, बस इस बात के लिए इतने परेशान हो। अगर ऐसा प्रश्न ले कर मेरी बेटी मेरे सामने खड़ी होगी तो मैं उससे कहूँगा, तुम्हारी कोई बुआ नहीं है, एक हुआ करती थी जो दस साल पहले हमारी दुनिया से चली गई। तुम्हारा सिर्फ़ एक चाचा है बस। सुन कर मुझे बहुत दुःख हुआ किसी तरह आँसूओं नो निकलने से रोक पाई। उन्होंने बड़े ही रोष से आगे कहा, मुझे लगता है हमारे बीच अब आगे बात करने को कुछ नहीं है सो मैं चलता हूँ। पूरी बातचीत में भैया ने एक बार भी मुझे नहीं देखा, बहुत तकलीफ़ हुई। उठते उठते भैया अनुराग को देखते हुए कहते हैं, मैंने तो सोंचा था काम-धंधे या फिर आर्थिक सहायता के लिए तुम लोग आए हो। वही होता तो अच्छा रहता, तुम्हारी परेशानी से मुझे सूकुन मिलता। उनकी ऐसी बातें सुन कर हम दोनो को बहूत ग़ुस्सा आया। मैं तो उनके इस बात का जवाब भी देने वाली थी लेकिन अनुराग ने मुझे रोक दिया। पहले भी भैया ने ऐसा ही बर्ताव हमारे साथ किया था और आज भी वही किया। इतने सालों में उनके रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया।

बात हमारी शादी के साल भर बाद की है। एक बार बड़े भैया अनुराग के पास, उनके अफिस में आए थे। उस समय वह स्कूल के किताबों के डिस्ट्रिब्यूशन का काम करते थे। उनका काम उस दौरान कुछ गड़बड़ चल रहा था और पूँजी की जरूरत थी। भैया का प्रस्ताव था कि अनुराग उनके साथ पार्ट्नर्शिप में काम करे और पूँजी लगाए । अनुराग ने इसके लिए उन्हें मना कर दिया पर उन्हें यह कहा कि उनको जितने पैसे की ज़रूरत है वह दे देंगे,समय पर परिवार वाले ही एक दूसरे की मदद करते हैं। भैया को यह पसंद नहीं आई। भैया का स्वभाव अनुराग जानते थे। पहले ही इतनी दूरी थी कहीं साथ काम कर के दरार ना आ जाए ये सोंच कर अनुराग भैया के साथ पार्ट्नर्शिप में काम नहीं करना चाहते थे। हमारी शादी के दौरान जैसा किरदार बड़े भैया ने निभाया था उसके बाद उनके साथ काम करना मूर्खता ही होती ये अनुराग समझते थे। हमारी शादी के लिए शायद पापा मान भी जाते लेकिन बड़े भैया हमेशा ही उनपर हावी रहे और पापा को दिल से सोंचने का मौक़ा ही नहीं मिला था, तथ्यों को समझने ही नहीं दिया गया था।

इतना तो समझ आ ही गया था की बड़े भैया तो मानने वाले नहीं हैं और दूसरों को भी कुछ सोंचने-समझने नहीं देंगे। हमदोनो घर आ गए और विचार करने लगे की आगे क्या किया जाए। माँ से मिले या बड़ी भाभी से मिल कर कुछ रास्ता निकलें या छोटे भैया से मिलें। माँ से बात करने का वैसे तो कोई फ़ायदा नहीं था क्योंकि घर में उनकी किसी ने नहीं सुननी है बस माँ से बात करके मन थोडा हल्का हो जाता। हाँ बड़ी भाभी, भैया से बिलकुल ही अलग है। भैया का बिगड़ा सुधार कर वह घर को बांधे रखी हैं नहीं तो जहाँ दो बहुयें और सास हो और बड़े भैया जैसा इंसान तो वह घर जुड़ा नहीं रह सकता। हमने उनसे मिलने की सोंची क्योंकि हम किसी तरह इन रिश्तों की डोर को फिर से जोड़ना चाहती थी ताकि आने वाली पीढ़ी को इस कड़वाहट से दूर रह सके, उन तक रिश्तों के टूटने की आवाज़ नहीं पहुँचने देना चाहते थे।


क्रमशः


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