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Gulab Jain

Others


5.0  

Gulab Jain

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ये ज़िन्दगी...

ये ज़िन्दगी...

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भागती और दौड़ती ये ज़िन्दगी |

सब को पीछे छोड़ती ये ज़िन्दगी | 

ख़्वाब थोड़े पूरा करती ये ज़िन्दगी,

और थोड़े तोड़ती ये ज़िन्दगी |


हर कदम पे है नया इक इम्तहाँ,

कोई भी समझे न इसकी दास्ताँ,

कर के हैरां छोड़ती ये ज़िन्दगी |


मासूमियत के पहन मुखौटे यहाँ,

कैसी - कैसी चाल ये चलता जहाँ,

कर के परीशां छोड़ती ये ज़िन्दगी |

         


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