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संदीप सिंधवाल

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संदीप सिंधवाल

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वसंत आगमन

वसंत आगमन

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ह्रदय में प्रेम रंग भरने को

हुआ ऋतुराज का आगमन,

प्रकृति फिर सजी है दुल्हन सी

प्रफ्फुलित सा आज है गगन।


हर एक पुष्प कली सुगन्ध से 

कालीनों सा रंगीन है वासंती,

ओंसों के मोती का मोल नहीं

लुभावनी धूप में नम है धरती।


पंत निराला महादेवी की कलम 

बसंत बखान करती छायावाद

ये कवित्व मन जगता उपवन में

सौन्दर्य से दूर होता मन अपवाद।





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