वक्त
वक्त
1 min
343
रूठना क्या मेरे मन--
सरकता है वक्त, क्षण-क्षण
मुदत्तों से ये बैरी है मेरा
हाथ पकड़ूँ, फिर भी रुकता नहीं।।
कदम-दर-कदम
करती हूँ कोशिश, साथ चलने का
ये वक्त है, मेरे मन
कभी भी मुझे समझता नहीं।।
प्रकृति ने ढ़ाल लिया
खुद को, इसके हवाले किया
विभीषिकाओं में भी अब
बहुत देर तक, यह ठहरता नहीं।।
