STORYMIRROR

Indu Kothari

Others

4  

Indu Kothari

Others

विभावरी

विभावरी

1 min
393

 विभावरी तू अंतस विभोर कर गयी

 संग लिए चन्द्रिका गगन में उतर गई

 निस्तब्दता चीर निशा थी झलक रही

 नयन नीर तुहिन बूंद सी ढुलक रही

  

 राका और राकापति सदियों से संग थे

 आंगन खुशियों के नित,बजते मृदंग थे

 पर आज कुछ अनमनी सी बात थी

 तारों भरी वह कुछ ज्यादा सर्द रात थी

  

 निशीथ व्योम विचरते निशापति को 

 निहार एक तारिका निढाल कर गयी

 अनंत भी उसे निर्निमेष निहारता रहा

 हाले ए -दिल नैनन सों बयां कर रहा

  

 वितान तान निशा बेफिक्र हो पसर गयी

 विछुड़ती बदली, विधू को अखर गयी

 कड़क कर दामिनी घटा को जगा गयी

 जाने क्यों वफ़ा चांद की, उसे दगा दे गई


 देखने तमाशा बयार भी निकल पड़ी 

 पैर उचका झरोखे पर हो गयी खड़ी 

 दूर से ही दादुर, उसे सचेत कर गया

 निश्चिंत हो खुद तडाग में उतर गया

 

खद्योत लघु लालटेन हाथ में लिए

तलाशने यामिनी संग संग चल दिए

अरुण रथ लिए क्षितिज पर थे खड़े

मुदित दिनकर प्राची पर निकल पड़े।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन