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Anshu sharma

Inspirational

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Anshu sharma

Inspirational

तुम अगर साथ हो तो

तुम अगर साथ हो तो

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विभा का आज आखिरी पेपर था। वो खुशी से फूली नहींं समा रही थी। अब बस सुमी के साथ खूब बातें करेगी। बी.ए की परीक्षा दी थी। जैसे ही घर के दरवाजे पर कदम रखा जोर से आवाज करती हुई माँ को बोली माँ "जल्दी से खाना दे दो, फिर मैं आज देर तक सुमी से मिलने जाँँऊगी। "हाँ हाँ ,पहले खाना खा फिर चली जाना। जल्दी जल्दी कपड़े बदल कर खाना खाने बैठ गयी। माँ तुमने खाना खाया ? विभा ने पूछा। नहींं, तेरे बाबूजी आते होगें, तभी खा लूँँगी।

विभा, सुमी के घर गयी। सुमी की मम्मी बोली, "आज तुम दोनोंं के पेपर खत्म हो गये और एक खुश खबर भी देनी है। "लो खीर खाओ ! विभा उत्ससुकता से पूछने लगी, "आंटी पहले आप खुशखबर बताओ। सुमी की मम्मी ने बताया, "अभी पता चला सुमी की जहाँ शादी की बात चल रही थीं, उन्होने हाँ कर दी।" लड़का बड़ी कम्पनी मेंं है और परिवार भी बहुत अच्छा है। राज करेगी, कहकर सुमी की मम्मी, सुमी को देखकर हँसने लगी।



सुमी अभी शादी के लिए तैयार नहीं थी। वो कुछ बनना चाहती थी। लाख बार समझाने के बाद भी मम्मी पापा  हाथ से अच्छा लड़का जाने नहीं देना चाहते थे। विभा ने खीर खाई और खुब तारीफ भी की। वो भी आंटी को समझाने में असर्मथ थी।

समय तेजी से बीत गया। विभा ने बी.एड. किया और उसकी शादी भी इन्जीनियर रोहित से हो गयी। सुमी ने भी मम्मी, पापा की खुशी में अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया। दोनोंं अपनी जिन्दगी मैं खुश और व्यस्त हो गयी। पहले कभी कभी फोन पर बात हो जाती थी।


फिर वो भी धीरे धीरे कम हो गयी, दोनोंं के परिवार भी अलग अलग शहर में बस गये। बचपन की दोस्ती भूले नहीं थे, बस गृहस्थी में उलझ गये थे। 

एक दिन विभा को स्कूल के काम से कम्पयूटर सिखने के लिए दूसरी स्कूल की शाखा में भेजा गया। जैसै स्कूल के बाहर आॉटो को रुपये  देकर घूमी, तभी किसी से टकराई देखा तो कोई और नहीं वह सुमी थी। दोनोंं गले मिलकर रोए जा रही थी। विभा और सुमी ऐसे मिलेगी सोचा भी ना था।



दोनोंं के पास समय कम था, इसलिये सुमी ने बताया वो पास में ही रहती है..दोनोंं ने फोन नंबर लिए और अगले दिन सुमी के घर मिलने का वादा किया। दोनों ने अपने घर बात बताई। खुशी के मारे विभा सो नहीं पा रही थी।    

अगले दिन विभा ने जल्दी काम किया अपनी चार साल की बेटी को लेकर सुमी के पहुँँच गयी। सुमी के भी पाँँच साल की बेटी थी, बच्चों को खाने के लिए बिस्कुट देकर रसोई में बातें करते करते पकोड़े बनाने लगी। विभा सवाल पर सवाल पूछ रही थी।  


सुमी चुप चुप सी धीरे धीरे जवाब दे रही थी पर विभा को सुमी, सुमी नहीं लग रही थी, कुछ तो था जो सुमी छिपा रही थी। दोनों की बेटी आपस में खुब घुल-मिल गयी थी। खाना खाते समय विभा से रहा नहीं गया।


विभा ने पूछा सूमी सच सच बता क्या बात है ?देख, "मैं बिना पूछे नहीं जाने वाली। "सुमी की आँँखों से आँँसू बहते जा रहे थे। सुमी कहने लगी, "विभा मेंरे पति की कम्पनी बंद हो गयी।" कोई नौकरी नहीं मिल रही। ससुराल की भी जिम्मेंदारी है..पता नहीं क्या होगा ? 

काश ! मैंने कोई तेरी तरह कुछ किया होता। तो इनका सहारा बनती। विभा ने सुमी को चुप कराया और समझाया सब ठीक हो जायेगा। नौकरी दूसरी जल्दी ही मिल जाएगी और जल्दी मिलने का वादा कर घर आ गयी।

घर आकर काम में मन ही नहीं लग रहा था। ये बात अपने पति को बतायी। उसके पति ने ध्यान दिलाया," विभा तुम कहती थी सुमी खाना बहुत अच्छा बनाती है।" विभा का चेहरा खिल गया और पुरानी बातें सुनाने लगी कि कैसे, उसकी मम्मी और वो कुछ ना कुछ बनाते तो विभा के लिये जरूर रखते।

तब हो गया तुम्हारी सहेली की समस्या का समाधान। रोहित मुस्कुराते हुये बोला विभा चहकते बोली क्या सोचा ! जल्दी बताओ ? रोहित बोला मेरी कम्पनी में जो दोस्त अकेले रहते हैं उन्हें अच्छा खाना नहीं मिलता। सुमी केटरिगं यानी घर का खाना बना कर दे सकती है।


फोन पर विभा ने सारी बातें, सुमी को बतायी सुमी ने डरते डरते हाँ कर दी। खाना कैसे जायेगा ? इसका इंतजाम भी रोहित ने कर दिया था ।

पहले दिन खाने की बहुत तारिफ हुई। सुमी का विश्वास और बढ़ गया और ऑर्डर आने लगे। सुमी के पति को भी दो-तीन महीने में दूसरी नौकरी भी मिल गयी। 

दोनों के पति भी अच्छे दोस्त बन गये थे। सुमी और उसका पति दोनों का धन्यवाद करते जा रहे थे। विभा ने सही अर्थ में अपनी सहेली को उसके पैरों पर खड़ा कर दिया था। जो वो शादी से पहले करना चाहती थी। सही मायने में दोस्ती का अर्थ, सुख दुख में साथ निभाना था। दोनों परिवार और करीब आ गये था। विभा हँसते हुए कहने लगी अभी तो ये दोस्ती बुढ़ापे तक साथ निभेगी...सब एक साथ बोले ये वादा रहा।


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