तन्हाई
तन्हाई
तन्हाई एक प्यारी सी लड़की की
तन्हाई एक छोटी सी बच्ची की
जब वो तन्हा हो जाती थी
बुरे ख्यालों में खो जाती थी
उसे तन्हा रहना अच्छा लगता था
महफिल से चुप होना अच्छा लगता था
आखिर क्यूं अकेले में तन्हा हो जाती थी
आखिर क्यूं कसमकस किसी के ख्याल में खो जाती थी
उसे उदास हमे देखना ना अच्छा लगता था
उसका महफिल में ठहाका लगाते देखना अच्छा लगता था
महफिल में चुप होकर रहती है वो
तन्हाई में अश्रु से पलको को भिगोती है वो
जब वो महफिल में स्माइल करती है
मधुमक्खी जैसे फूलो से शहद जैसे भरती है
वैसे तो वो बहुत मजबूत है वो
वैसे तो वो साक्षात देवी की रूप है वो
जब वो हसंती है तो जैसे सबेरा होता है।
बेजान महफिल भी जैसे गुलजार सा होता है
जिस दिन वो तन्हा होती है पूरा दिन जैसे कब्रिस्तान सा होता है।
तन्हाई से मैं उसके डरता था
उसके खुश होने से मैं हरदम चहकता रहता था
शायद उसकी तन्हाई से थोड़ी बनती थी
रुसवाई में जैसे वो मन की सुनती थी
कभी कविता तो कभी गजल वो लिखा करती थी।
तन्हाई में आहे भरा करती थी।
पंक्षियो व आसमानो से बिन सैर की बाते किया करती थी।
थी तो कमाल फिर भी वो औरो से खुद को कम तर कहती थी
वो कोई और नहीं तन्हाई को जो अपना सच्चा दोस्त जो कहती थी
छोटी छोटी बातो से उसके आंखो में अश्क भर जाता था
दर्द को समेटे रहती थी वो फिर भी
उसके जुवा पे कुछ ना आता था
तन्हाई को अपनी सहेली बताती थी
उसके गोंद में बैठ अपने मन की बात
कलम से कह जाती थी
मुझे उसके तन्हाई से डर लगता है
तन्हाई में छुपे बुरे सैलाब से भी डर लगता है
वो लड़की थी फिर भी कमजोर नही
उसकी लिखावट का भी कोई तोड़ नहीं
उसकी मानवता का भी कोई मोल नही
लोग औरत को कमजोर कहते हैं
हम भी अपनी दोस्त को दुर्गा स्वरूप भी कहते है
पढ़ने में बहुत मेघावी है।
शरारत करना उसकी आदत है
भावुक होना उसकी कमजोरी है
वो कोई और नहीं मेरी सच्ची सी प्यारी दोस्त तन्हाई है।।
अश्रु उसका सच्चा दोस्त और खामोशी कोई और नही उसकी प्यारी सी सहेली है।
