तेरे झूठे वादों का
तेरे झूठे वादों का
कब आया कब चला गया
कुछ पता ही ना चला,
दिन हफ्ते महीने कब बीते
कुछ पता ही ना चला,
ऐ वक्त तू धीरे धीरे चलता
तो हमको भी एहसास होता,
तू तो इतनी रफ्तार से चला कि
साल कब बीता पता ना चला ।
जनवरी फरवरी तो बीत गया
ठंड में और करते रहे तेरा इन्तेजार हम,
तेरे वादे तो झूठे निकले आज कल पर टलते रहे,
आया मार्च तो लगा आओगे तुम मेरे जन्मदिन के बहाने ही,
पर तब भी तुम हमको दग़ा दे गए,
वादे तेरे थे झूठे और झूठे हो तुम भी,
तुम पर कर के भरोसा हम हो गए है परेशान अब ।
अप्रैल मे जून के भी रहा कुछ हाल यूँ,
वक्त अपना गुजार लिया सोशल साइट पर लिख लिख कर ही,
जुलाई अगस्त तो था सावन का मौसम बारिश ने बेहाल किया,
कर आये हम दर्शन तब बालाजी के मंदिर के,
तेरी ना फिर भी कोई खबर झूठे निकले तेरे वादे ।
सेप्टेम्बर में गणपति जी घर पधारे वक्त गुजरा उनकी सेवा में,
उनकी विदाई के संग ही टूटा पहाड़ हम पर भी,
मां के साथ हुआ हादसा उनकी जान पर बन आयी,
वक्त गुजर गया हॉस्पिटल में उनके साथ ही,
उनकी हुई तबियत ठीक तो अक्टूबर में थोड़ी जान आयी ।
त्योहारों का मौसम अक्टूबर था बीत गया जैसे तैसे,
आया नवंबर तो फिर तेरे वादों का सिलसिला सुरु हुआ,
जाने कौन से कामो में हो मशरूफ तुम वादे करके तोड़ते हो,
हम ने वक्त अपना गुजार लिया इधर उधर घूम कर ही ।
अब तो दिसंबर भी बीत गया तेरा कोई ठिकाना नहीं ,
एक बार भी हम मिल ना पाए तुझसे ऐसा रहा मनहूस ये साल,
रह जायेगा अब याद ये साल तेरी यादों के साथ गुजारा,
तेरे झूठे वादों का साल मेरे सच्चे इन्तेजार का साल ।
