STORYMIRROR

दयाल शरण

Others

4  

दयाल शरण

Others

ताक़ीद

ताक़ीद

1 min
171

जब कभी भी तुम मुझको

कहीं खोजा करना

कद से ऊंची चाहतों को

ज़रा अलहदा रखना


तुम्हे पता है कि बनावट से

ज़रा ज्यादा गुरेज है मुझको

घर से निकलो तो उनको

संग लेकर नहीं चलना


मेरी परवरिश में रिश्ता है

तालीम में भी रिश्ता

घर में ग़र खाक भी खोजना है

तो जज्बातों को तवज्जो देना 


बन्धनों का अपना वजन तो होता है

संग चलना तो कंधों में ताकत रखना

मन से उतरे तो रंग फिर कहाँ चढ़ता है

कूचियों को यह मर्म भी बता रखना


कीमती वक्त ग़र तुम्हारा है

तो बेशक हमारा भी है

वक्त पे बेवक्त कोई राग

ना कभी छेड़ा करना!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from दयाल शरण