स्त्री
स्त्री
हे स्त्री तुम कौन हो ?
सरस्वती हो,
जो ज्ञान का भण्डार बांटती हो,
दुर्गा हो,
जो सबके कष्ट निवारती हो,
या काली हो, विकराल रूपधर, दुष्टों को संघारती हो,
तुम कौन हो ?
राम की सीता हो,
जो वन मे साथ चली थी,
प्रमाण देने पवित्रता का
अग्नि परिक्षा दी थी,
या हो तुम कृष्णा की राधा,जिसके बिन श्याम अधूरा है,
या हो तुम कान्हा की मीरा
जिसने विष पान किया है.
तुम कौन हो ?
सत्युग की सती हो, या कल युग की प्रताड़ित हो रही आत्मा
या हो तुम महादेव की अर्धांगिनी,या हो तुम महिषासुर मर्दनी ?
समुद्र मंथन से प्राप्त रम्भा हो ,
या हो तुम देवी लक्ष्मी
या हो अमृत का प्याला
या हो कल्पवृक्ष रमणीय ?
तुम कौन हो ?
तुम पवित्र नदियों का पानी हो ?
या कोई खुशरंग कहानी हो ?रामायण का श्लोक हो ?
या सूरज का आलोक हो ?कुरान की रूबाईयां हो ?
या रामचारित मानस की चौपाईयां हो ?बाईबिल की पवित्रता हो ?
या गुरु ग्रंथ जैसी गीता हो ?
तुम कौन हो ?
ऊर्जा का स्त्रोत हो ?
कई ऊलझनों से ओत प्रोत हो ?
हो जीवन दायिनी पर ,
खुद के जीवन को संघर्षित हो
तुम कौन हो ?
बच्चों के लिए उनका संसार हो
परिवार को शोभित करता अलंकार हो
माँ की लोरियाँ हो,
या…सबको प्रेम से बांधने वाली डोरियाँ हो ?
कभी बहन बन , कलाई की राखी हो ?
कभी हाथ थामे,…जीवन की संगी साथी हो ?
सुबह की प्रथम किरण हो ?
या मन के बगीचे में ,
विचरण करती हिरण हो ?
तुम कौन हो ?
बचपन मे घर की कलियां हो ?
बड़े होकर घर की खुशियां हो ?
पापा की प्यारी गुड़िया हो ?
माँ की प्यारी सखियां हो ?
तुम कौन हो ?
आँखो की प्यास बुझाने की कठपुतली हो ?
या देह प्यास मे जलने वाली सुतली हो ?
या निष्ठुर समाज से घायल निर्भया हो ?
या परदे ,तलाक़ ,दहेज आगजली की हया हो ?
तुम कौन हो ?
झांसी की रानी हो ,
या इंग्लैंड की महारानी हो ,या देश की प्रथम नागरिक हो ,
या आसमान मे उड़ने वाली नारी हो तुम कौन हो ?
सुबह से शाम तक चलने वाली घड़ी हो कैसी भी हो मुश्किल
परिवार के संग हमेशा खड़ी हो,दादा दादी के हाथों की छड़ी हो ,
खुशियों की जलती हुई लड़ी हो ,तुम कौन हो ?
एक अनसुलझी पहेली हो,
समाज मे अपने हक को लड़ती अकेली हो
दुनिया समझ रही है,
अब तुम्हारी भागीदारी
कीचड़ मे खिलती हुई कली हो तुम कौन हो ?
दुनिया समझ रही है,
अब तुम्हारी भागीदारी
कीचड़ मे खिलती हुई कली होतुम कौन हो ?
स्त्री खुद जवाब देती है .........
एक रूप मे अनेको रूपों की माला हूँ
नीलकन्ठ के गले की मैं हाला हूँ
मैं हूँ वरदांन खुद की ऊर्जा का
ब्रमांण्ड मे ग्रहों की माला हूँ
मैं हूँ गंगाजल,
मैं हूँ कृष्णा की मुरली ,
मैं हूँ काली दुर्गा भी ,
मैं हूँ सरस्वती सुरिली
मैं सूरदास की आँखें हूँ
मैं हूँ रसखान की कविता ,
मैं हूँ रहीम के दोहे ,
मैं हूँ कबीर की सरिता
मैं धर्म को परिभाषित करती
कल कल करती नादियां हो ,
तुम हो तारों का ज़मघट तुम खुशियों की बगिया हूँ।
ऐसी स्त्री स्वरुप को मेरा श्रद्धा सुमन ....
हे स्त्री तुम जगजननी ,
प्रकृति की तुम मृगनयनी ,
श्रष्टि की तुम रचयिता ,
हर दुःख की तुम हरिता ,
शब्दों में कैसे गान करूँ
सूक्ष्म रूप में तुम ही तुम
तुम हो विशाल काया
हाथ जोड़ कर बद्ध नमन हे माया हे माया।
