सफर की किताब
सफर की किताब
1 min
145
दिन के उजाले में सोते रहे
रात के अन्धेरे में घूमते रहे
जब हुआ ज्ञान सफर का तो
हम अंत करीब पहुंच गए
अब दिन का न उजाला न रात का अँधेरा
सफर में सिर्फ रहा है अन्धेरा ही अँधेरा
अब हम न आगे जा सकते न पीछे
पंथ का पूर्ण विराम ही सफर निशान
कौन कहाँ से आया है कौन कहाँ जाएगा
किसका रिश्ता व् काम किसके साथ
पीछे देख के रोना नहीं आगे देख उलझना नहीं
वक्त की रफ्तार में बहते जा पहले से निश्चित है किताब
