सफर की किताब
सफर की किताब
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दिन के उजाले में सोते रहे
रात के अन्धेरे में घूमते रहे
जब हुआ ज्ञान सफर का तो
हम अंत करीब पहुंच गए
अब दिन का न उजाला न रात का अँधेरा
सफर में सिर्फ रहा है अन्धेरा ही अँधेरा
अब हम न आगे जा सकते न पीछे
पंथ का पूर्ण विराम ही सफर निशान
कौन कहाँ से आया है कौन कहाँ जाएगा
किसका रिश्ता व् काम किसके साथ
पीछे देख के रोना नहीं आगे देख उलझना नहीं
वक्त की रफ्तार में बहते जा पहले से निश्चित है किताब
